कैपà¥à¤Ÿà¤¨ विजयंत थापर, वीर चकà¥à¤° (मरणोपरांत) का जनà¥à¤® 26 दिसंबर 1976 को à¤à¤• सैनà¥à¤¯ परिवार में करà¥à¤¨à¤² वीà¤à¤¨ थापर और शà¥à¤°à¥€à¤®à¤¤à¥€ तृपà¥à¤¤à¤¾ थापर के घर हà¥à¤† था। सैनà¥à¤¯ परिवार में पले-बढ़े कैपà¥à¤Ÿà¤¨ थापर हमेशा अपने पिता के नकà¥à¤¶à¥‡à¤•दम पर चलना चाहते थे। बचपन में, वह अकà¥à¤¸à¤° बंदूक के साथ खेलते थे और अपने पिता की टोपी पहनकर और à¤à¤• अधिकारी की तरह अपनी छड़ी पकड़कर घूमते थे। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने अपने सपने को आगे बढ़ाया और आईà¤à¤®à¤ देहरादून में चयनित होने के लिठकड़ी मेहनत की। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने अपने पà¥à¤°à¤¶à¤¿à¤•à¥à¤·à¤£ में बहà¥à¤¤ अचà¥à¤›à¤¾ पà¥à¤°à¤¦à¤°à¥à¤¶à¤¨ किया और उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ सेना की रसद शाखा, आरà¥à¤®à¥€ सरà¥à¤µà¤¿à¤¸ कोर में नियà¥à¤•à¥à¤¤ किया गया।
कैपà¥à¤Ÿà¤¨ विजयंत को उनकी पहली नियà¥à¤•à¥à¤¤à¤¿ 1998 में गà¥à¤µà¤¾à¤²à¤¿à¤¯à¤° में 2 राजपूताना राइफलà¥à¤¸, à¤à¤• पैदल सेना बटालियन में सेवा देने के लिठकी गई थी। उगà¥à¤°à¤µà¤¾à¤¦ विरोधी अà¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤¨ चलाने के लिठयूनिट के कशà¥à¤®à¥€à¤° में सà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¤¾à¤‚तरित होने से पहले वह à¤à¤• महीने तक वहां रहे थे। कैपà¥à¤Ÿà¤¨ विजयंत हमेशा बाहरी गतिविधियों के शौकीन थे और शाम को हमेशा पलटन (बटालियन) में रहते थे, पहलवानों, मà¥à¤•à¥à¤•ेबाजों और अनà¥à¤¯ खिलाड़ियों को देखते थे। à¤à¤• वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ के रूप में वह बहà¥à¤¤ दयालà¥, विचारशील और मितवà¥à¤¯à¤¯à¥€ थे। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने अपने जीवन की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ में ही धरà¥à¤® अपना लिया था और à¤à¤• पà¥à¤¯à¥‚रिटन का जीवन जीना चाहते थे। फिट रहने के लिठउनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने संतà¥à¤²à¤¿à¤¤ आहार लिया और जिम में कड़ी मेहनत की। 1999 में कैपà¥à¤Ÿà¤¨ विजयंत दो à¤à¥€à¤·à¤£ मà¥à¤ à¤à¥‡à¤¡à¤¼à¥‹à¤‚ में शामिल थे। टेलीफोन पर अपनी मां से बात करते हà¥à¤ उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने बताया कि कैसे उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने à¤à¤• लाइव मà¥à¤ à¤à¥‡à¤¡à¤¼ का सामना किया, जिसमें उन पर लगà¤à¤— तीस गोलियां चलाई गई थीं। बाद में उनकी यूनिट को टोलोलिंग, टाइगर हिल और आसपास की ऊंचाइयों पर कबà¥à¤œà¤¾ कर चà¥à¤•े पाक बलों के खिलाफ ऑपरेशन करने के लिठकारगिल सेकà¥à¤Ÿà¤° के दà¥à¤°à¤¾à¤¸ में जाने का काम सौंपा गया था।
11 जून 1999 को, करà¥à¤¨à¤² à¤à¤®.बी. की कमान के तहत कैपà¥à¤Ÿà¤¨ विजयंत की बटालियन। रविंदरनाथ को टोलोलिंग नामक सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर कबà¥à¤œà¤¾ करने का काम सौंपा गया था। मेजर मोहित सकà¥à¤¸à¥‡à¤¨à¤¾ दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤à¥€ हमले को रोके जाने के बाद, 12 जून 99 की रात को कैपà¥à¤Ÿà¤¨ विजयंत थापर ने बारबाड बंकर नामक पाकिसà¥à¤¤à¤¾à¤¨à¥€ सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ पर कबà¥à¤œà¤¾ करने के लिठअपनी पलटन का नेतृतà¥à¤µ किया, जो टोलोलिंग के लिठआगे की लड़ाई के लिठमहतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ साबित हà¥à¤†à¥¤ इस हमले के दौरान अगल-बगल और पीछे से हà¥à¤ˆ गोलीबारी में 2 पाकिसà¥à¤¤à¤¾à¤¨à¥€ सैनिक मारे गà¤à¥¤ 13 जून 1999 को तोलोलिंग à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ सेना की पहली जीत थी और यà¥à¤¦à¥à¤§ में निरà¥à¤£à¤¾à¤¯à¤• मोड़ थी।
बाद में 28 जून को 2 राज रिफ़ को थà¥à¤°à¥€ पिमà¥à¤ªà¤²à¥à¤¸, नॉल और लोन हिल कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° पर कबà¥à¤œà¤¼à¤¾ करने का काम दिया गया। हमले की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ तब हà¥à¤ˆ जब कैपà¥à¤Ÿà¤¨ विजयंत की पलटन पूरà¥à¤£à¤¿à¤®à¤¾ की रात को बिना किसी कवर के तेज धार वाली पहाड़ी पर आगे बढ़ रही थी। तीवà¥à¤° और सटीक तोपखाने गोलाबारी और दà¥à¤¶à¥à¤®à¤¨ की à¤à¤¾à¤°à¥€ गोलीबारी हà¥à¤ˆà¥¤ उसने अपने कà¥à¤› पà¥à¤°à¤¿à¤¯ लोगों को खो दिया और कà¥à¤› अनà¥à¤¯ घायल हो गठजिससे हमला बाधित हो गया। हालाà¤à¤•ि, अपनी अदमà¥à¤¯ à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ और दृढ़ संकलà¥à¤ª के साथ, वह दà¥à¤¶à¥à¤®à¤¨ का सामना करने के लिठअपने सैनिकों के साथ खडà¥à¤¡ से आगे बढ़े। वह पूरà¥à¤£à¤¿à¤®à¤¾ की रात थी और उस सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर कबà¥à¤œà¤¾ करना बहà¥à¤¤ कठिन था। दà¥à¤¶à¥à¤®à¤¨ की 6 नॉरà¥à¤¦à¤°à¥à¤¨ लाइट इनà¥à¤«à¥ˆà¤‚टà¥à¤°à¥€ की टà¥à¤•ड़ियों को सà¤à¥€ फायदे थे।
रात 8 बजे हमला तब शà¥à¤°à¥‚ हà¥à¤† जब 120 तोपों से गोलीबारी शà¥à¤°à¥‚ हो गई और आसमान रॉकेटों से जगमगा उठा। गोलीबारी के इस à¤à¤¾à¤°à¥€ आदान-पà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¨ में 2 राज रिफ कैपà¥à¤Ÿà¤¨ विजयंत थापर के साथ हमले का नेतृतà¥à¤µ कर रहे थे। इस लड़ाई में सबसे पहले शहीद होने वालों में कैपà¥à¤Ÿà¤¨ विजयंत के बहà¥à¤¤ पà¥à¤°à¤¿à¤¯ अरà¥à¤¦à¤²à¥€ सिपाही जगमाल सिंह थे। आख़िरकार कैपà¥à¤Ÿà¤¨ विजयंत की कंपनी ने नॉल पर अपना कबà¥à¤œà¤¼à¤¾ जमा लिया। इस समय तक उनके कंपनी कमांडर मेजर पी आचारà¥à¤¯ मारे जा चà¥à¤•े थे. इस समाचार से कà¥à¤°à¥‹à¤§à¤¿à¤¤ होकर कैपà¥à¤Ÿà¤¨ विजयंत अपने साथी नायक तिलक सिंह के साथ आगे बढ़े। दोनों ने महज 15 मीटर की दूरी पर दà¥à¤¶à¥à¤®à¤¨ से लोहा लेना शà¥à¤°à¥‚ कर दिया। दà¥à¤¶à¥à¤®à¤¨ की तीन मशीनगनें उनकी ओर गोलीबारी कर रही थीं। लगà¤à¤— डेढ़ घंटे की à¤à¥€à¤·à¤£ गोलीबारी के बाद कैपà¥à¤Ÿà¤¨ विजयंत को à¤à¤¹à¤¸à¤¾à¤¸ हà¥à¤† कि दà¥à¤¶à¥à¤®à¤¨ की मशीनगनों को अपने उदà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¥à¤¯ की ओर आगे बढ़ने के लिठचà¥à¤ª कराना होगा।
नॉल से आगे की पहाड़ी बहà¥à¤¤ संकरी और तीखी थी और केवल 2 या 3 सैनिक ही साथ-साथ चल सकते थे। यहां मारे जाने का खतरा बहà¥à¤¤ वासà¥à¤¤à¤µà¤¿à¤• था और इसलिठकैपà¥à¤Ÿà¤¨ विजयंत ने नायक तिलक सिंह के साथ खà¥à¤¦ आगे बढ़ने का फैसला किया। कैपà¥à¤Ÿà¤¨ विजयंत साहसी कदम उठाते हà¥à¤ à¤à¤¸à¤¾ करने के लिठआगे बढ़े, लेकिन आग की चपेट में आ गà¤, जो उनके सिर पर लगी। वह अपने साथी नायक तिलक सिंह की बाहों में गिर गये। कैपà¥à¤Ÿà¤¨ विजयंत शहीद हो गठलेकिन उनके साहस और नेतृतà¥à¤µ से पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤¿à¤¤ होकर, उनके सैनिकों ने बाद में दà¥à¤¶à¥à¤®à¤¨ पर हमला किया और नोल पर पूरी तरह से कबà¥à¤œà¤¾ कर लिया। 29 जून 1999 को नोल में जीत, बेजोड़ बहादà¥à¤°à¥€, धैरà¥à¤¯ और दृढ़ संकलà¥à¤ª की गाथा है। कैपà¥à¤Ÿà¤¨ विजयंत थापर को उनकी वीरता, अदमà¥à¤¯ लड़ाई की à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ और सरà¥à¤µà¥‹à¤šà¥à¤š बलिदान के लिठ"वीर चकà¥à¤°" (मरणोपरांत) से समà¥à¤®à¤¾à¤¨à¤¿à¤¤ किया गया।
सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ विवेकानंद सà¥à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€ विशà¥à¤µà¤µà¤¿à¤§à¤¾à¤²à¤¯ की ओर से कैपà¥à¤Ÿà¤¨ विजयंत थापर, वीर चकà¥à¤° (मरणोपरांत) को उनकी पà¥à¤£à¥à¤¯à¤¤à¤¿à¤¥à¤¿ पर बारंबार नमन !




