मेजर उत्तम चंद कटोच का जन्म 31 मई 1944 को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित नगरोटा में हुआ था। पाँच भाई-बहनों में सबसे बड़े होने के नाते उन्होंने जीवन में कम उम्र में ही जिम्मेदारी का मूल्य सीख लिया था। कम उम्र में अपने पिता को खोने से वे दृढ़ता, लचीलेपन और अटूट प्रतिबद्धता वाले व्यक्ति के रूप में सामने आए। चाहे एक समर्पित पुत्र के रूप में एक प्यार करने वाले पति के रूप में, एक स्नेही पिता के रूप में या एक समर्पित अधिकारी के रूप में वे जीवन भर इन मूल्यों पर अडिग रहे। कांगड़ा घाटी की शांत पहाड़ियों से मेजर कटोच ने काफी हद तक अपने प्रयासों से प्रतिष्ठित भारतीय सैन्य अकादमी (IMA), देहरादून तक का रास्ता बनाया। IMA में बिताए उनके समय ने उन पर गहरा प्रभाव डाल। उनके चरित्र को आकार दिया और उन्हें एक सैनिक के जीवन के लिए तैयार किया। वर्ष 1971 में वे सेना में शामिल हुए और उन्हें आर्मी सर्विस कोर (ASC) में नियुक्त किया गया।
एक उत्साही पाठक और आजीवन सीखने वाले मेजर कटोच ने लगातार ज्ञान की खोज की और अपने करियर में इसे प्रभावी ढंग से लागू किया। उनकी सेवा ने उन्हें सागर, सुंदरबनी, ग्वालियर, बिनागुरी, कोटा, उधमपुर, श्रीगंगानगर और सिकंदराबाद सहित भारत भर में विभिन्न परिचालन इकाइयों और संरचनाओं में ले जाया। उनके नेतृत्व का एक और उदाहरण तब मिला जब उन्हें श्रीगंगानगर में 554 एएससी बटालियन की कमान संभालने का सम्मान मिला। अपनी पेशेवर उपलब्धियों से परे मेजर कटोच अपने गर्मजोशी भरे और मिलनसार स्वभाव के लिए जाने जाते थे। उन्हें दोस्तों की मेज़बानी करना, जीवंत चर्चाओं में शामिल होना और स्वागत करने वाला माहौल बनाना पसंद था। एक उत्साही गोल्फ़र और भावुक रसोइया उन्हें खेल और पाक कला दोनों में आनंद मिलता था। उनका जीवन अनुशासन, सौहार्द और सेवा की भावना का एक वसीयतनामा था जो उन्हें जानने वालों के लिए एक स्थायी विरासत छोड़ गया।
वर्ष 1989 में मेजर उत्तम चंद कटोच सिकंदराबाद स्थित अपनी यूनिट के साथ सेवारत थे । उनकी यूनिट को भारतीय शांति सेना (IPKF) के अभियान के हिस्से के रूप में श्रीलंका जाने का काम सौंपा गया था ताकि वहां की अस्थिर स्थिति को स्थिर किया जा सके। भारतीय सेना को अगस्त 1987 में इस धारणा के तहत शामिल किया गया था कि खूंखार लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (LTTE) सहित आतंकवादी समूह आत्मसमर्पण कर देंगे। हालाँकि LTTE ने समझौते से मुकर गया और भारतीय सेना के खिलाफ बड़े पैमाने पर युद्ध शुरू कर दिया। शुरुआत में केवल 54 डिवीजन को तैनात किया गया था लेकिन जैसे-जैसे संघर्ष बढ़ा, तीन और डिवीजनों- 3, 4 और 57 को कार्रवाई में लाया गया। 1989 तक भारतीय सेना ने LTTE के खिलाफ कई ऑपरेशन किए थे।
संघर्ष क्षेत्र में मेजर कटोच और उनके सैनिकों को विभिन्न मिशनों का समर्थन करने के लिए अक्सर आगे बढ़ना पड़ता था। हर कदम में काफी जोखिम था क्योंकि रास्ते खतरों से भरे थे। छुपे हुए आईईडी (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) और एलटीटीई आतंकवादियों द्वारा आश्चर्यजनक हमले। जीवित रहने के लिए निरंतर सतर्कता आवश्यक थी। 24 मार्च 1989 को त्रिंकोमाली के बाहरी इलाके में एक टोही मिशन का नेतृत्व करते समय मेजर कटोच और उनकी टीम पर अचानक हमला हुआ। एक पेड़ के सहारे खड़ी एक लावारिस साइकिल के भीतर छुपाई गई एक आईईडी गश्ती दल के पास पहुंचते ही फट गई। विस्फोट के बाद एलटीटीई आतंकवादियों की ओर से भारी गोलीबारी हुई। तेजी से प्रतिक्रिया करते हुए मेजर कटोच ने तुरंत मोर्चा संभाला अपने सैनिकों को इकट्ठा किया और दुश्मन के साथ भीषण गोलीबारी में शामिल हुए उनके साथ मेजर सुरेश हर्षा और सिपाही रमेश बबन शिंदे ने भी अंत तक अपने साथियों की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।
अपने सामने आए भयंकर खतरों के बावजूद मेजर कटोच ने अपने परिवार के लिए खतरों के बारे में शायद ही कभी बात की हो। वे अक्सर श्रीलंका को सुंदर और शांतिपूर्ण बताते थे जिससे उनकी पत्नी को चिंता से बचाया जा सके क्योंकि उन्हें तीन बच्चों की देखभाल करनी थी। 24 मार्च 1989 को आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में वे गंभीर रूप से घायल हुए और शहीद हो गए। उनका बलिदान कर्तव्य और अपने राष्ट्र के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उनकी स्मृति पीढ़ियों को प्रेरित करती रहती है। हमें स्वतंत्रता की कीमत और इसकी रक्षा करने वालों की अदम्य भावना की याद दिलाती है।
मेजर उत्तम चंद कटोच के परिवार में उनकी पत्नी श्रीमती बिमला कटोच, पुत्र डॉ. विक्रम कटोच और बेटियां डॉ. नम्रता कटोच और श्रीमती स्वाति कटोच हैं।
स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से मेजर उत्तम चंद कटोच को उनकी जयंती पर बारंबार नमन !




