स्वतंत्रता की कीमत चुकानी होती है, यह मुफ़्त में नहीं मिलती और न ही बचती .......
रेज़ांगला लद्दाख का वह स्थान है जो लद्दाख की सुरक्षा हेतु अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह 16000 फुट की ऊँचाई पर है एवं यहाँ पर पारा शून्य से भी नीचे रहता है। वर्श 1962 में इस स्थान की रक्षा करने के लिए कुमाऊँ रेजीमेन्ट की 13 बटालियन की चार्ली कम्पनी तैनात थी, जिसमें कमांडर मेजर शैतान सिंह एवं उनके साथ 117 आदमी थे। 18 नवम्बर 1962 की सुबह चीन के लगभग 5000 सैनिकों ने इस चौकी पर धावा बोल दिया। सभी जवानों ने मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में अपने से कहीं अधिक बड़ी संख्या में चीन के फौजियो ं का जमकर मुकाबला किया। इस लड़ाई में भारत के मेजर शैतान सिंह सहित 114 लोगों ने शहादत प्राप्त की। इस टुकड़ी के वीरों की शहादत के कारण ही आज लद्दाख भारत का हिस्सा बना हुआ है।
जब रेज़ांगला को बाद में बर्फ हटने के बाद फिर से देखा गया तो खाईयों में मृत जवान पाए गए जिनकी उंगलियाँ अभी भी अपने हथियारों के ट्रिगर पर थीं, परन्तु उनके हथियारों में गोलियां नहीं थीं ..... इस कम्पनी का हर एक आदमी कई गोलियों या छर्रों के घावों के साथ अपनी ट्रेंच में मृत पाया गया। मोर्टार मैन के हाथ में अभी भी बम था। मेडिकल अर्दली के हाथों में एक सिरिंज और पट्टी थी, जब चीनी गोली ने उसे मारा....। सात मोर्टार को छोड़ कर सभी को एक्टिव किया जा चुका था और बाकी सभी मोर्टार पिन निकाल कर दागे जाने के लिए तैयार थे। यह संसार का सबसे भीषण लास्ट स्टैंड वार फेयर था जहाँ 114 वीरों ने वीरता से लड़ते हुए लगभग 1300 चीनी सैनिकों को मार डाला था और चीन के लद्दाख को कब्जाने के मंसूबो पर पानी फेर दिया था।
मातृभूमि के समस्त शहीदों को नमन एवं जय हिन्द।




