वर्ष 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध के अन्तर्गत डोगराई की लड़ाई महत्वपूर्ण लड़ाई मानी गयी है। वर्ष 1965 सितम्बर माह तक पाकिस्तान सेना ने पर्याप्त युद्ध सामग्री एकत्र करते हुए इस क्षेत्र में अपनी स्थिति अत्यन्त सुदृढ कर ली थी। भारत के लिये ये चिंता का विषय था।
सितम्बर माह के तृतीय सप्ताह में भारतीय सेना की 54वीं इन्फेन्ट्री बिग्रेड को डोगराई क्षेत्र से शत्रु सेना को बाहर कर डोगराई क्षेत्र पर अधिकार करने का आदेश प्राप्त हुआ। इस युद्ध अभियान के अन्तर्गत 21 सितम्बर 1965 की रात्रि में शत्रु सेना पर आक्रमण करने का निर्णय लिया गया।
21 सितम्बर को 3 जाट बटालियन के कमांडिग ऑफिसर लें कर्नल डेस्मंड हेड अपनी यूनिट के वीर सैनिकों के साथ डोगराई क्षेत्र पर अधिकार प्राप्त करने के लिए उत्साहपूर्वक आगे बढे़। उस समय पाकिस्तानी सेना के तोपखाने और टैंक आग उगल रहे थे, परन्तु निर्भीक एवं वीर भारतीय सैनिक आगे बढ़ते रहे। उन्होंने पाकिस्तानी सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। भारतीय सैनिकों की वीरता के आगे रण क्षेत्र में ही शत्रु सेना के पैर उखड़ने लगे। इस लड़ाई के मध्य ही सूबेदार खजान सिंह युद्ध भूमि में घायल हो गये। परन्तु घायल वीर सिपाही और उनकी टोली ने क्षेत्र खाली करने से मना कर दिया और निरन्तर वीरता पूर्वक शत्रुओं सेना को परास्त करने में प्रयासरत रहे।
22 सितम्बर 1965 को लड़ाई का द्वितीय दिवस था। 3 जाट बटालियन की सी और डी कम्पनी को रात्रि 2 बजे शत्रु पर आक्रमण करने का आदेश प्राप्त हुआ। सी टोली आगे बढ़ते हुए शत्रु सेना द्वारा घेर ली गयी। ऐसे संकट के समय में 3 जाट बटालियन के जाबांज वीर सिपाही सूबेदार पीले राम ने तत्काल निर्णायक आदेश देते हुए अपने सिपाहियों को दाहिने ओर से आगे बढने का आदेश दिया। टोली ने अपने सूबेदार के आदेश का पालन किया और आगे बढ़ने लगी। स्थिति कठिन थी, शत्रु सेना निरन्तर आक्रमण कर रही थी, ऐसे में नेतृत्व करने वाले वीर सिपाही सूबेदार पीले राम युद्ध भूमि में गंभीर रूप से घायल हो गये। परन्तु भारत के इस वीर ने अपना धैर्य और साहस नहीं खोया और निरन्तर अपनी टोली का साहस बढ़ाते हुए आगे बढ़ते रहे और मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी।
इस युद्ध क्षेत्र में दूसरी ओर मेजर आशाराम त्यागी की प्लाटून ने शत्रु के टैंको पर आक्रमण कर दिया। भयंकर गोलीबारी के मध्य भी भारतीय सैनिक ‘‘शत्रु टैंकों को पहले ध्वस्त करना है’’ उद्घोष के साथ आगे ही बढ़ते रहे, भारतीय सैनिकों में अपूर्व उत्साह था। अचानक भारत की धरती के वीर मेजर आशाराम त्यागी पाकिस्तान के स्क्वाड्रन कमाण्डर की गोली से घायल हो गये परन्तु फिर भी उन्होंने शत्रु को परास्त कर भारत भूमि से बाहर करने का लक्ष्य नहीं छोड़ा और अन्त में अत्यन्त वीरता पूर्वक लड़ते हुए उन्होने अपने प्राणों की आहुति दे दी।
डोगराई क्षेत्र में कैप्टन थापा और उनके साथी सैनिक दूसरी ओर नहर किनारे से आगे बढ़ते रहे। इसी बीच अचानक कैप्टन थापा पाकिस्तानी सेना द्वारा फेंके गये ग्रेनेड से गंभीर रूप से घायल हो गये परन्तु उन्होंने साहस नहीं खोया और अपनी टोली को तीव्रता से आगे बढ़ने का आदेश देते रहे। लक्ष्य सामने ही था कि अचानक शत्रु की गोली कैप्टन थापा के हेलमेट में लगी और वे शहीद हो गये।
22 सितम्बर 1965 की प्रातः काल 4 बजे भारतीय सेना की जाट रेजीमेन्ट के सैनिकों ने डोगराई क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया। पाकिस्तानी सेना ने भारी मशीनगनों और टैंकों से भारतीय सेना के अडिग, साहसी कदमों को रोकने का भरपूर प्रयास किया परन्तु सफल नहीं हो सकी। 22 सितम्बर की रात्रि में हुए युद्ध में शत्रु सेना के पैर उखड़ गए। उस रात तक भारतीय वीरों ने शत्रुसेना के चार आक्रमणों का अत्यन्त कुशलता और शौर्य के साथ सामना किया।
23 सितम्बर 1965 को युद्ध विराम घोषित कर दिया गया परन्तु तब तक भारतीय सैनिकों ने अपने अदम्य साहस और वीरता का परिचय देते हुए अपने सच्चे भारतीय होने का प्रमाण सम्पूर्ण विश्व को करा दिया। ऐसे अनुपम भारतीय वीरों की वीरता और बलिदान को शत्-शत् नमन। युद्धोपरान्त मेजर आशाराम त्यागी एवं कैप्टन थापा को उनके शौर्य और वीरता के लिए महावीर चक्र तथा सूबेदार पीले राम को वीर चक्र से अंलकृत किया गया।




