टाइगर हिल तोलोलिंग के पष्चिम में है। टाइगर हिल की ऊंचाई अधिक होने के कारण वहां से एक बड़े क्षेत्र पर निगाह रखी जा सकती है। उधर प्वाइंट 4875 सीधे ड्रॉस सैक्टर नेषनल हाईवे को प्रभावित करता है जिस रास्ते से लॉजिस्टिक सपोर्ट आगे की तरफ भेजी जा सकती थी। इस सम्पूर्ण क्षेत्र में पाकिस्तान की नॉर्दन लाइट इन्फेंट्री द्वारा धोखे से कब्ज़ा कर लिया गया था। इसे वापिस जीतना भारतीय सेना के लिए एक बड़ी चुनौती थी।
निर्णायक हमला 3 जुलाई की षाम को आरंभ हुआ जिसमें 8वीं बटालियन, सिख रेजिमेंट, 18 ग्रेनेडियर्स एवं दूसरी बटालियन नागा रेजिमेंट (2 नागा) सम्मिलित थे। आर्टिलरी रेजिमेंट की 22 बैटरियों ने, जिसमें मल्टी-बैरेल रॉकेट लॉन्चर भी षामिल थे, लगातार 13 घंटों तक चोटी पर दुष्मन के ठिकानों पर हमला किया, जिससे पहाड़ पर आगे बढ़ने वाली पैदल सेना को कवरिंग फायर मिला। 18 ग्रेनेडियर्स की अल्फा और चार्ली कम्पनियों के 200 जवान, बटालियन के घातक प्लाटून के साथ पहाड़ के पीछे की ओर, 1,000 फुट ऊंची खड़ी चट्टान पर आगे बढ़ी। ऊंचाई अधिक होने के कारण दुष्मन चढ़ते हुए सैनिकों को दूर से ही देख सकता था और उन पर फायरिंग कर सकता था इसलिए ऊपर चढ़ने का समय रात का निर्धारित किया गया। सैनिक रात भर चलते और चढ़ते थे और दिन भर चुपचाप पत्थरों में पड़े रहते थे। इस तरह दो रात और एक दिन धीरे-धीरे पहाड़ी के ऊपर चढ़ाई की।
तीसरे दिन जब सैनिक ऊपर की ओर चढ़ रहे थे तो दुष्मनों ने उन्हें देख लिया और उन पर जबरदस्त फायरिंग आरंभ कर दी। अंततः केवल सात सैनिक ही ऊपर चढ़ पाए। ऊपर पहुंचते ही इन जवानों ने दुष्मन के दो बंकरो में गोलीबारी की जिससे दुष्मन के 4-5 सिपाही मारे गए और भारतीय सिपाही उन बंकरो में घुसकर दुष्मन पर गोलीबारी करने लगे। लगभग 50-60 मीटर चोटी से दुष्मन के सिपाहियों ने भी भारतीय सिपाहियों पर अंधाधुंध गोलीबारी आरंभ करदी। 5 घंटे तक गोलीबारी चलती रही और भारतीय सैनिकों के पास अब गोला-बारूद समाप्त होने लगा था। ऐसी स्थिति में एक योजना के तहत भारतीय सिपाहियों द्वारा गोलीबारी बंद कर दी गई। भारतीय सैनिकों की गोलीबारी बंद होने से यह सोचकर कि भारत के सारे सिपाही मारे गए होंगे, चोटी पर स्थित दुष्मन के सिपाही खुले में आ गए। उनके खुले में आते ही भारतीय जवानों ने उन पर गोली चलानी आरंभ कर दीं जिससे दुष्मन के अनेकों सिपाही मारे गए। पाकिस्तान के सिपाहियों की संख्या अत्यधिक होने के कारण धीरे-धीरे भारत के उन सात सैनिकों में छह षहीद हो गए केवल एक योगेन्द्र यादव बचे। उनके हाथ और पैर में एक-एक गोली लगी एवं वे गिर पड़े तभी पाकिस्तान के एक सिपाही ने उनकी छाती पर गोली मारी। सौभाग्य से योगेन्द्र यादव की जेब में पाँच-पाँच रूपये के कुछ सिक्के मौजूद थे वह गोली उन सिक्कों से टकराकर पलट गई। योगेन्द्र यादव ने गंभीर रूप से घायल होते हुए भी अपना ग्रीनेड निकालकर उसे सिपाही पर फेंका। ग्रीनेड के फटने से वह सिपाही तो मर ही गया परन्तु उसके धमाके से पाकिस्तान के अन्य सैनिकों में भी भगदड़ मच गई। उधर और अधिक हिम्मत करके योगेन्द्र यादव द्वारा उस सिपाही की राइफल लेकर पाकिस्तानी सैनिकों पर पलट कर तीन स्थानों से गोलीबारी की गई पाकिस्तानी के सैनिक यह समझकर कि भारतीय सेना की कुमक वहां आ गई, वहां से भाग गए और योगेन्द्र यादव खिसकते-खिसकते चोटी पर पहुंच गए। योगेन्द्र सिंह यादव को कुल 17 गोलियां लगीं और उन्होंने टाइगर हिल पर कब्ज़ा करने में प्रमुख भूमिका निभाई। 08 जुलाई 1999 को प्रातः काल में टाइगर हिल टॉप (16700 फीट) पर कब्ज़ा कर लिया गया।
18 ग्रेनेडियर्स के योगेन्द्र सिंह यादव को युद्ध के दौरान उनके कार्यों के लिए भारत गणराज्य के सर्वोच्च सैन्य सम्मान, परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
सुभारती परिवार टाइगर हिल की लड़ाई में षहीद हुए सभी वीर एवं अमर सैनिकों को नमन करता है। जय हिन्द।




