अप्रैल 1965 से मई 1965 के बीच पाकिस्तानी सेना ने तीन भारतीय पहाड़ी पोजीशनों पर धोखे से अधिकार कर लिया और जिहादियों को कष्मीर में प्रवेश कराने एवं विध्वंसकारी कार्यों द्वारा बुनियादी ढ़ांचे को नश्ट करने के उद्देष्य से अगस्त 1965 के आरम्भ में पाकिस्तान ने ऑपरेषन जिब्राल्टर को अंजाम दिया।
पाकिस्तान की योजनाओं का पता लगने पर भारतीय सेना ने घुसपैठियों के विरूद्ध जवाबी कार्यवाही आरम्भ की जिसमें कई घुसपैठिये मारे गए। 15 अगस्त 1965 को भारतीय सेना ने संघर्श विराम रेखा को पार किया और उन तीन पहाड़ी स्थानों पर फिर से अधिकार कर लिया जिनपर पाकिस्तान ने अधिकार कर लिया था और जहाँ से पाकिस्तानी सेना श्रीनगर-लेह राजमार्ग पर गोलीबारी कर रही थी। हाजी पीर बल्ज जो भारत में घुसपैठ के लिए एक प्रमुख केन्द्र और प्रवेश मार्ग था।
26 अगस्त की रात 09ः30 बजे 1 पैरा बटालियन ने सांक की ओर पश्चिम से युद्धविराम रेखा को पार किया जिसमें कांटेदार तार और खदानें स्थापित थीं। बिग्रेड कमांडर ब्रिगेडियर बक्शी स्वयं हमलावर बल का हिस्सा थे। हमला बहुत कठिन परिस्थिति, दुर्गम इलाके और भारी बारिश में किया गया। भारतीय टुकड़ी आगे बढ़ी और अगली सुबह 04ः15 तक बल ने सांक पर अधिकार कर लिया। सांक पर कब्ज़ा करने के बाद बटालियन ने सर और लेदी वाली गली पर आक्रमण किया और उसी दिन दोनों पर अधिकार प्राप्त किया।
हाजी पीर दर्रा पहुंचने पर 1 प्लाटून छोड़कर मेजर दयाल ने अपनी बाकी टुकड़ी का नेतृत्व किया और भारी वर्शा के बावजूद दर्रा के पष्चिमी भाग पर चढ़ गए। पाकिस्तानी रक्षक पहाड़ी से नीचे भाग गए। 28 अगस्त को 10ः30 बजे तक हाजी पीर दर्रा पर अधिकार कर लिया गया। पाकिस्तानी ब्रिगेड ने 29 अगस्त को पलटवार किया लेकिन 1 पैरा ने हमले को विफल कर दिया और साथ ही कुछ अन्य स्थानों पर अधिकार कर लिया और अपनी स्थिति को सुदृढ़ कर लिया।
19 वीं बटालियन, पंजाब रेजिमेंट ने 26 अगस्त को पथरा पर अधिकार कर लिया लेकिन चौथी बटालियन, राजपूत रेजिमेंट अत्यधिक बीहड़ इलाके के कारण बेदोरी पर अधिकार करने में असमर्थ रहे और उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा। 19 वीं बटालियन, पंजाब रेजिमेंट के कमांडर लेफ्टिनेंट कर्नल सम्पूरण सिंह ने एक अलग दिषा से बेदोरी पर हमला किया और 29 अगस्त तक पाकिस्तानी बलों के मजबूत प्रतिरोध के बावजूद बेदोरी पर अधिकार प्राप्त कर लिया। 5 सितम्बर को चौथी बटालियन, राजपूत रेजिमेंट ने बिसाली पर अधिकार कर लिया लेकिन पाकिस्तानी बलों के द्वारा पलटवार के कारण उसे सांक वापिस आना पड़ा। 10 सितम्बर तक 93 इन्फेन्ट्री ब्रिगेड ने सभी यूनिट्स के साथ मिलकर हमला किया और पूरा हाजी पीर भाग भारत के नियंत्रण में आ गया।
छह अधिकारियों एवं 65 जवानों की षहादत से सम्पूर्ण हाजी पीर बल्ज और हाजी पीर दर्रे पर हुआ भारत का अधिकार एक बड़ी रणनीतिक जीत थी क्योंकि इसने घुसपैठियों के लॉजिस्टिक सेट अप को बेअसर कर दिया और प्रवेष मार्गों को बंद कर दिया। बाद के ताशकन्द समझोते में भारत ने हाजी पीर को पाकिस्तान को वापिस सौंप दिया।
सुभारती का मानना है ऐसी स्थिति में कोई राजनैतिक निर्णय सेना के जवानों की षहादत को याद रखकर ही लेना चाहिए। हमारा कहना यह नहीं है कि ताषकन्द समझौते के समय इस विशय को ध्यान नहीं दिया गया होगा।
सुभारती परिवार हाजी पीर की लड़ाई में षहीद हुए भारतीय सेना के सभी जवानों को नमन करता है। जय हिन्द।




