आरंभ में ईस्ट इंडिया कंपनी केवल व्यापार करने के उद्देश्य से भारत में आई थी परन्तु धीरे-धीरे राजनैतिक महत्वाकांक्षा से उसने भारत के विभिन्न क्षेत्रों पर अपना अधिकार करना आरंभ कर दिया। सबसे पहले नवाब सिराजुद्दोला के सेनापति मीर जाफ़र की गद्दारी से सन् 1757 में उसने प्लासी का युद्ध जीता। सन् 1764 में बक्सर का युद्ध जीता। सन् 1843 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने सिंध क्षेत्र पर अधिकार कर लिया और 1849 में पंजाब पर भी उसका अधिकार हो गया। सन् 1853 में मराठा पेशवा की पदवी छीन ली। सन् 1854 एवं 1856 के बीच झाँसी, अवध, सतारा, नागपुर और संबलपुर को कंपनी के राज्य में मिला लिया गया। भारत के एक बड़े भाग पर राजनीतिक अधिकार प्राप्त कर लेने के उपरांत कंपनी सरकार ने जनता का विभिन्न प्रकार से शोषण करना आरंभ कर दिया। साथ ही धर्म परिवर्तन का कार्य भी चला। जनता का रोष का एक क्रान्ति के रूप में परिणित हुआ।
क्रान्ति संपूर्ण भारत में 30 मई 1857 को प्रारंभ होनी थी। परंतु 10 मई 1857 को मेरठ में इस क्रान्ति का समय से पूर्व ही बिगुल फूंकना पड़ा। धनसिंह कोतवाल मेरठ कोतवाली के प्रमुख थे। 10 मई को धनसिंह कोतवाल के आदेश पर हजारों की संख्या में क्रांतिकारी रातों-रात मेरठ पहुंचे और इन स्वतंत्रता सेनानियों ने जेल, कचहरी, टेलीग्राफ अफिस पर अधिकार कर लिया। देर रात 2 बजे जेल तोड़कर 836 कैदियों को आजाद कराकर जेल को आग लगा दी गई। सभी कैदी क्रान्ति में सम्मिलित हो गए। 11 मई की सुबह दिल्ली लाल किले पर पहुंचकर उन्होंने बहादुर शाह जफ़र को अपना राजा घोषित कर दिया। दिल्ली में भी इन सेनानियों ने सभी अंग्रेजी सरकार के कार्यालयों पर अधिकार कर लिया। जैसे ही दिल्ली पर स्वतंत्रता सेनानियों के कब्जे का समाचार फैला तो एक के बाद एक विभिन्न स्थानों पर क्रान्ति आरंभ हो गई।
क्रान्ति के समय से पहले आरंभ हो जाने से सभी जगहों पर अंग्रेज चौकस हो गए। इस कारण इस क्रान्ति का जैसे कि मेरठ और दिल्ली में प्रभाव हुआ था वैसे सभी स्थानों पर नहीं हो सका। अंततः क्रान्ति असफल हो गई। कंपनी सरकार ने धनसिंह कोतवाल को मुख्य रूप से दोषी ठहराया और गिरफ्तार कर मेरठ में ही फांसी पर लटका दिया। 4 जुलाई 1857 को प्रातः 4 बजे पांचली पर 56 घुड़सवारों, 38 पैदल सिपाहियों ने 10 तोपों से हमला किया। पूरे ग्राम को तोप से उड़ा दिया गया। पांचली के 80 लोगों को फांसी की सजा दी गई एवं ग्राम गगोल के भी 9 लोगों को फांसी दे दी गई ओर पूरे ग्राम को नष्ट कर दिया।
शहीद धनसिंह कोतवाल एवं शहीद हुए समस्त क्रान्तिकारियों को सुभारती परिवार का नमन। जय हिन्द।




