तोलोलिंग की लड़ाई हिमालय की दुर्गम पहाड़ियों पर भारत भूमि की रक्षा हेतु लड़ी गयी वह लड़ाई थी जिसने भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस और देश भक्ति से विश्व को आश्चर्य चकित करा दिया। इस लड़ाई में भारतीय सैनिकों ने माइनस-10 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले वातावरण में प्रकृति के झंझावातों से जूझते हुए दुश्मन पर अभूतपूर्व विजय प्राप्त की।
कारगिल क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग नम्बर 1 के मध्य हिमालय पर्वत माला में 16,000 फीट की ऊँचाई पर तोलोलिंग नामक एक महत्वपूर्ण सैनिक चौकी है। ये चौकी 510 किलोमीटर लम्बे श्रीनगर-लेह-कारगिल मार्ग पर ऊपर से निगाह रखती है। अति महत्वपूर्ण इस सामरिक चौकी को पाकिस्तान की सेना ने शान्ति के समय धोखे से अपने अधिकार में ले लिया था और वहाँ अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली थी। पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से अपने अधिकार में ली गई इस महत्वपूर्ण चौकी को पाकिस्तान से छुड़ाने के लिए ये लड़ाई लड़ी गई। तोलोलिंग की लड़ाई कारगिल युद्ध का एक भाग थी। तोलोलिंग चोटी पर विजय पाना अत्यन्त आवश्यक और महत्वपूर्ण था। इस लड़ाई में भारतीय सेना की 18 ग्रेनेडियर्स, 16 ग्रेनेडियर्स 1 नागा रेजीमेन्ट, 2 राजपूताना राइफल्स सम्मिलित थी जिन्होंने पाकिस्तान की नर्थन लाइट इन्फैंट्री की एक पूर्ण बटालियन की शक्ति को विनष्ट कर शत्रु पर विजय प्राप्त की थी। इस युद्ध में भारत के 23 वीर सैनिक शहीद हुए और 70 गम्भीर रूप से चोटिल हुए। इसका मुख्य कारण दुर्गम और बर्फीली भौगोलिक परिस्थितियां थी। भारत के वीर सैनिकों के शौर्य और बलिदान से तीन सप्ताह तक चली इस लड़ाई में भारतीय सेना ने अंततः विजय प्राप्त करते हुए युद्ध को एक निर्णायक दिशा प्रदान की।
22 मई 1999 को आपरेशन करने से पूर्व नागा, गढ़वाल और ग्रेनेडियर रेजीमेन्ट की तीन बटालियनों ने दो तरफ से तोलोलिंग तक अपना मार्ग बनाने का अथक प्रयास किया। 18 ग्रेनेडियर की दो प्लाटून तोलोलिंग चोटी के नीचे पहाड़ी पर फंसी रही जहाँ पर शत्रु सैनिकों द्वारा उन पर निरन्तर दृष्टि रखी जा रही थी और उन पर गोलीबारी की जा रही थी। स्थिति की भयावहता को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना ने अलग-अलग टास्क कोर्स नियुक्त किए। 31 मई 1999 तक तोलोलिंग चोटी पर अधिकार करने के लिए दो प्रयास किये गये। 2 और 3 जून की मध्यरात्रि को पुनः प्रयास किया गया। अन्तिम प्रयास 12 और 13 जून 1999 की मध्य रात्रि को भारतीय सेना की 2 राजपूताना राइफल्स द्वारा किया गया। 12 जून 1999 को अन्तिम आक्रमण से पूर्व भारतीय सेना ने तोलोलिंग चोटी के समान ही उसकी निकट की चोटी पर एक माक आपरेशन चलाते हुए आक्रमण की तैयारी की। तत्पश्चात् 13 जून 1999 की प्रातः, 2 राजपूताना राइफल्स के कमांडिंग अफसर कर्नल एम.वी. रवीन्द्रनाथ की टोली ने रात्रि भर चले इस भीषण युद्ध में द्रास सेक्टर की प्रमुख चौकी पर अधिकार प्राप्त कर लिया। अति महत्वपूर्ण और निर्णायक इस युद्ध में यूनिट के एक अधिकारी दो जे सी और सात सैनिकों ने देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति प्रदान कर दी।
रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण तोलोलिंग की विजय भारतीय सैनिकों की वीरता और प्रतिबद्धता का प्रतीक है। भारतीय सेना के प्रमुख अधिकारियों द्वारा तोलोलिंग के युद्ध को एक अति महत्वपूर्ण संवेदनशील और आत्मघाती मिशन बताया गया। इस लड़ाई ने पाकिस्तानी सेना की कमर तोड़ कर रख दी। इस लड़ाई से प्राप्त अनुभवों ने भारत को टाईगर हिल समेत अनेकों पहाड़ी चौकियों पर विजय प्राप्त करने में भी बहुत सहायता प्रदान की।
सुभारती परिवार का तोलोलिंग आक्रमण में हुए समस्त शहीद सैनिको को सादर नमन! जय हिन्द!




