पाकिस्तान राइफल्स की छग्गा नय्या चौकी के इंचार्ज हेड कांस्टेबल नूरुद्दीन एक बंगाली अधिकारी थे एवं भारत की श्रीनगर चौकी पर तैनात श्री परिमल कुमार घोष के दोस्त थे। भारत द्वारा ईस्ट पाकिस्तान राइफल्स के विद्रोही सैनिकों को सहायता देने के लिए परिमल घोष को प्रोफेसर अली के नाम का परिचय पत्र बनाकर नूरुद्दीन के साथ 29 मार्च को पूर्वी पाकिस्तान में भेजा गया जहां उन्होंने पाकिस्तान राइफल्स के 6 जवानों को बांग्लादेश की मिट्टी हाथ में लेकर यह शपथ दिलवाई कि वे आगे से मुक्ति वाहिनी के लिए काम करेंगे। विद्रोही लड़ाकों ने यह जानकर कि भारत ने मुक्ति वाहिनी की सहायता करने का निर्णय लिया है, परिमल घोष को कंधों पर उठा लिया एवं नाचने गाने लगे। बीएसएफ के निदेशक के० रुस्तम जी थे एवं रॉ के निदेशक आर.एन. राव थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रुस्तम जी से कहा कि आप चाहे कुछ भी करें परंतु पाकिस्तान की सेना द्वारा आपके जवान पकड़े न जाएँ। 1 अप्रैल 1971 को अवामी लीग के दो वरिष्ठ नेताओं ताजुद्दीन अहमद एवं बैरिस्टर अमीरुल इस्लाम को दिल्ली लाया गया और उन्हें सेफ हाउस में पूरी निगरानी के साथ रखा गया एवं उनकी मुलाकात प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से करवाई गई। इन दोनों नेताओं ने बांग्लादेश के लिए अस्थायी संविधान की रचना बीएसएफ के लॉ ऑफिसर कर्नल एन.एस. बैंस एवं कलकत्ता के बैरिस्टर सुब्रत राय चौधरी के साथ मिलकर की। इन नेताओं के साथ यह निर्धारित किया गया कि बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा एवं सरकार के मंत्रियों का शपथ ग्रहण समारोह पूर्वी पाकिस्तान महापौर कस्बे के बैजनाथ ताल में किया जाये। इस कार्यक्रम को आयोजित करने और उसके प्रचार करने में बीएसएफ ने पूरी भूमिका निभाई एवं 200 पत्रकारों के काफ़िले को बैजनाथ ताल पहुंचाया गया। जिस जगह पर बांग्लादेश की घोषणा की जानी थी उस क्षेत्र की निगरानी करने के लिए भारतीय वायु सेना के विमान ऊपर चक्कर लगाते रहे ताकि पाकिस्तानी वायु सेना के द्वारा यदि कोई विघ्न डाला जाए तो उससे बचाव किया जा सके। भारत के पास के गांव से हारमोनियम एवं तबले का प्रबंध किया गया। अवामी लीग के सांसद युसुफ अली ने माइक पर बांग्लादेश की आजादी की घोषणा की एवं उसके बाद सभी मंत्रियों ने एक के बाद एक शपथ ली। बांग्लादेश का राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान गाया गया। बीएसएफ द्वारा पुराना रिकॉर्ड प्लेयर भी उपलब्ध कराया गया ताकि स्वाधीन बांग्लादेश केंद्र का प्रसारण शुरु किया जा सके। 27 मई 1971 की शाम को लेफ्टिनेंट कर्नल ज़िया उर रहमान ने कलूर घाट रेडियो स्टेशन से आजादी की घोषणा को प्रसारित किया। बीएसएफ के जवानों ने सादे कपड़े पहनकर 29 पुलों को उड़ाने में मुक्ति वाहिनी की सहायता की। जिन बीएसएफ के जवानों को वेश बदलकर पूर्वी पाकिस्तान में भेजा गया। उन्हें बहुत अच्छी तरीके से पूर्वी पाकिस्तान में प्रचलित अभिवादन के तरीकों एवं पांचो वक्त पढ़ी जाने वाली नमाज़ों के नाम याद कराए गए एवं नमाज़ पढ़ना सिखाया गया। उनके सभी मुस्लिम नाम रखे गए। इस ऑपरेशन में सीमा सुरक्षा बल के 125 सैनिक शहीद हुए एवं 392 सैनिक घायल हुए। 1971 की जीत के बाद बीएसएफ के निदेशक रुस्तम जी को एवं के. अश्वनी कुमार को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया एवं आई.जी. श्री गोलक मजूूमदार को परम विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया। वे इस सम्मान को पाने वाले पहले गैर सैनिक अधिकारी थे। सहायक कमांडेंट रामकृष्ण वाधवा को मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
बी.एस.एफ. के सभी शहीद जवानों को सुभारती परिवार का सादर नमन। जय हिन्द।




