असम के लोगों ने भी अंग्रेज़ों के शोशण, भेदभाव और अत्याचार के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन में बहादुरी से भाग लिया था। ऐसी ही एक घटना पथारूघाट में किसानों के ऐतेहासिक विद्रोह की है। पथारूघाट किसान विद्रोह एक शांतिपूर्ण विरोध था एवं एक अच्छी तरह से परिभाशित नेतृत्व की अनुपस्थिति में, जनता ने खुद को संगठित किया और अंग्रेज़ों के निरंकुश नेतृत्व का विरोध किया था।
घटना इस प्रकार है कि ब्रिटिश द्वारा असम पर कब्जे के बाद, इस राज्य की वृहद भूमि का सर्वेक्षण शुरू हुआ। इस तरह के सर्वेक्षणों के आधार पर, अंग्रेज़ों ने भूमि कर लगाना शुरू कर दिया जिस कारण से किसानों में असंतोश फैला। 1893 में, ब्रिटिश सरकार ने कृशीय भूमिकर को 70-80 प्रतिशत तक बढ़ाने का निर्णय लिया। इस कर के विरोध में किसान मिलकर सभा करते थे जिन्हें ‘राएज़ मेला’ कहा जाता था। इन सभाओं के लोकतांत्रिक होने के बावजूद, अंग्रेज़ उन्हें ‘‘देशद्रोह का प्रजनन मैदान’’ मानते थे, इसलिए जब भी कोई राएज़ मेला होता था, तो अंग्रेज़ उसको खदेड़ने के लिए भारी हथियारों के साथ आते थे।
पथारूघाट, असम के दरांग जिले का एक छोटा सा गाँव है, जो गुवाहटी से लगभग 60 कि.मी. उत्तर-पूर्व में स्थित है। 28 जनवरी, 1894 को राएज़ मेला था। किसानों के प्रतिनिधियों ने ब्रिटिश अधिकारी से बात करने की कोशिश की। जब ब्रिटिश अधिकारी ने किसानों की शिकायतों को सुनने से इंकार कर दिया, तब वहाँ माहौल गर्म हो गया। किसान अंग्रेज़ों के खिलाफ प्रदर्शन करने लगे। पुलिस ने पहले लाठी चार्ज किया उसके बाद ब्रिटिश अधिकारी ने सैनिकों को निहत्थे किसानों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया, जिसके कारण 100 से ज्यादा किसान गोलियों का शिकार होकर मारे गए।
इस घटना ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई दिशा दी थी और इसने स्वतंत्रता संग्राम को और मजबूत किया। पथारूघाट के शहीदों को हमेशा उनकी बहादुरी और उनकी मातृभूमि हेतु बलिदान के लिए याद किया जाता है। शहीद स्थल पर सेना द्वारा ‘‘शहीद स्तम्भ स्थल’’ के रूप में एक स्मारक भी बनाया गया है। हर साल 28 जनवरी को, सरकारी अधिकारी और स्थानीय लोग कृशक स्वाहिद दिवस पर शहीद स्मारक पर शहीद हुए किसानों की याद में पुश्प चढ़ाते हैं।
असमिया समुदाय के लिए, पथारूघाट, सराईघाट की लड़ाई के बाद दूसरे स्थान पर आता है।
सुभारती परिवार षहीद हुए सभी स्वतंत्रता आंदोलनकारी किसानों को नमन करता है। जय हिन्द।




