खालूबार का युद्ध एक ऐसा मौका था, जिसने भारतीय जवानों की बहादुरी और मौत से लड़ जाने की क्षमता को दिखाया था। पाकिस्तानी सैनिकों की कायरता को भी प्रदर्शित किया था।
खालूबार का युद्ध खालूबार रिज पर हुआ था। यह रिज लाइन अफ कंट्रोल के उत्तर से दक्षिण की तरफ फैला है। यानी सीधा निशाना एल.आ.ेसी पर आसानी से भारतीय सेना, बंकरों और लंबे मैदानी इलाकों पर नजर रखने की ताकत मिलती है यहां से, यहां पर कई ऊंचे, तीखे वर्टिकल क्लिफ हैं, साथ ही नुकीले और ब्लेड की तरह धारदार पत्थरों की पूरी एक फसल उगी हुई है. यहां पर चढ़ाई करना बेहद मुश्किल होता है. छोटी ऊंचाई पर जाना भी आसान नहीं होता। यहां गोरखा रेजिमेंट ने फतह हासिल की थी। लेकिन उनके लिए भी यह आसान नहीं था यहां उनके तीन दुश्मन थे पहला दुश्मन... पूरे सामान के साथ ऊपर चढ़ना पड़ता है. दूसरा- बार-बार मौसम का बदलना। तीसरा बेतहाशा ठंड, जहां पर तापमान शून्य डिग्री या उससे कम होता है। पाकिस्तान की कमर तोड़ने के लिए खालूबार को जीतना जरूरी था क्योंकि उसके पीछे पी.ओ.के था जहां पर पाकिस्तान ने अपना हैलिपैड बनाया था. जिससे उन्हें जरूरत का सारा सामान मिल रहा था।
6 जुलाई 1999 की रात को 1/11 गोरखा राइफल्स के कैप्टन मनोज पांडे ने अपने जवानों को बड़ी सी चट्टान के पीछे छोड़ा। दुश्मन की गन पोजिशन देख ली। इसके बाद जय महाकाली के युद्ध घोष के साथ सीधे दुश्मन के ऊपर सटीक निशाने के साथ फायरिंग की। मशीन गन के पीछे बैठा पाकिस्तानी जवान वहीं ढेर हो गया। कैप्टन पांडे को कंधे और पैर में गोली लगी। घायल होने बाद भी अगले बंकर की तरफ आगे बढ़े। ग्रैनेड फेंक कर उसे भी खत्म कर दिया। खुद के शरीर पर कई गोलियां लग चुकी थीं। शरीर छलनी हो चुका था। जब मनोज तीसरे बंकर में पीछे से घुसे तो देखा कि दो पाकिस्तानी गोरखा जवानों पर गोली चलाने वाले हैं। उन्होंने अपनी खुखरी निकाली और और उनकी गर्दन काट डाली। कैप्टन मनोज पांडे अब आखिरी गन पोजिशन की तरफ आगे बढ़े, उन्होंने बंकर के भीतर ग्रेनेड उछाला पर ग्रेनेड के गिरने और विस्फोट के बीच तीन से चार सेकेंड का फासला होता है, इतनी देर में तीन गोलियां मनोज के हेलमेट को चीरती हुई उनके सिर में घुस गई।
कैप्टन मनोज पांडे ने जाते-जाते अपने जवानों की विजय का आखिरी आदेश सुना गया। मनोज ने नेपाली में कहा ‘न छोड़ नूं’. उस दिन एक भी पाकिस्तानी सैनिक को चोटी से भागने का मौका नहीं मिला। दुश्मन को चुन-चुन कर मौत के घाट उतारा गया। जब खालूबार पर कब्जा किया तो उसका असर यह हुआ कि पाकिस्तान के पास जितने भी डिफेंसिव पोजिशन थे वो उसे संभाल नहीं पाए। दूसरी चोटियों से भी भागना शुरू कर दिया। कैप्टन मनोज पांडे को उनकी बहादरी के लिए वीरता के सर्वश्रेश्ट पुरूस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
सुभारती परिवार कैप्टन मनोज पांडे एवं खालूबार का युद्ध में हुए सभी शहीदों को नमन करता है। जय हिंद।




