आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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| DOB | 1923-01-31 |
| Martyr | Battle Casualty |
मेजर सोमनाथ शर्मा, "परमवीर चक्र" (मरणोपरांत) का जन्म 31 जनवरी 1923 को हिमाचल प्रदेश (तब पंजाब प्रांत) के कांगड़ा जिले में हुआ था। 22 फरवरी 1942 को वे सेना में शामिल हुए और उन्हें 4 कुमाऊँ रेजिमेंट में नियुक्त किया गया। 03 नवंबर 1947 को भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान मेजर सोमनाथ शर्मा और उनकी कम्पनी को बडगाम पहुंचने का आदेश मिला क्योंकि बडगाम उन मार्गों में से एक था जिसके माध्यम से पाकिस्तानी हमलावर श्रीनगर की ओर बढ़ रहे थे। उसी समय बड़गाम में 500 हमलावरों का एक समूह गुलमर्ग से बडगाम आया और जल्द ही उनकी कंपनी को तीन तरफ से घेर लिया। मेजर शर्मा की कम्पनी पर दुश्मन की ओर से भारी गोलीबारी और मोर्टार से बमबारी हुई जिसके कारण भारी क्षति हुई। परन्तु मेजर सोमनाथ शर्मा ने अपनी कंपनी को बहादुरी से जवाबी कार्रवाई करने के लिए प्रेरित किया और अपनी जान की परवाह किए बिना लड़ाई लड़ते रहे। इसी दौरान उनके पास बारूद के एक गोले का विस्फोट हुआ। जिस कारण वे गंभीर रूप से घायल हुए और वे वीरगति को प्राप्त हो गए। मेजर सोमनाथ शर्मा को उनके अदम्य साहस, अटल नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए देश के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार "परमवीर चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Major Somnath Sharma PVC को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!
| DOB | 1958-10-01 |
| Martyr | Battle Casualty |
मेजर अश्विनी कुमार कनवा, "विशिष्ट सेवा मेडल" (मरणोपरांत) का जन्म 01 अक्टूबर 1958 को दिल्ली में हुआ था। नवम्बर 1982 में वे सेना में शामिल हुए और उन्हें सेना चिकित्सा कोर में नियुक्त किया गया। 1987 के दौरान उन्हें सिकंदराबाद स्थित 93 फील्ड रेजिमेंट में नियुक्त किया गया। जुलाई 1987 में भारत-श्रीलंका समझौते के परिणामस्वरूप ऑपरेशन पवन शुरू हुआ तो मेजर अश्विनी 25 अक्टूबर 1987 को अपनी यूनिट के साथ आईपीकेएफ के हिस्से के रूप में श्रीलंका चले गए। 03 नवंबर 1987 को मेजर अश्विनी कुमार कनवा जाफना के बाहरी इलाके में सेना शिविर में घायल सैनिकों को चिकित्सा सहायता प्रदान करने में व्यस्त थे। तभी एक लिट्टे का आतंकवादी मरीज़ बनकर कैंप में घुसा और मेजर अश्विनी कुमार कनवा को बहुत करीब से गोली मार दी जिस कारण वे गंभीर रूप से घायल हुए और वीरगति को प्राप्त हो गए। मेजर अश्विनी कुमार कनवा को उनके साहस और उच्च कोटि की कर्तव्यपरायणता के लिए "विशिष्ट सेवा मेडल " (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Major Ashwini Kumar Kanva VSM को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







