आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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मेजर मुकुंद वरदराजन,अशोक चक्र (मरणोपरांत) का जन्म 12 अप्रैल 1983 को केरल के कोझिकोड जिले में हुआ था। उन्हें 2006 22 राजपूत बटालियन में लेफ्टिनेंट के रूप में नियुक्त किया गया था। दिसंबर 2012 में, उन्हें आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए जम्मू-कश्मीर में तैनात 44 आरआर बटालियन में तैनात किया गया था। 25 अप्रैल 2014 को खुफिया सूत्रों से शोपियां जिले के काजीपथरी गांव में जैश-ए-मोहम्मद कमांडर अल्ताफ वानी समेत कुछ कट्टर आतंकियों की मौजूदगी की जानकारी मिली थी जिनके विरुद्ध भारी गोलीबारी के दौरान, मेजर मुकुंद को भी तीन गोलियां लगीं और उन्हें 92 बेस अस्पताल ले जाया गया, लेकिन लकिन वे रस्ते में ही वीरगित को प्राप्त हो गए। मेजर मुकुंद को कर्तव्य से परे वीरता प्रदर्शित करने के लिए देश का सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार "अशोक चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया था। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से जयंती पर बारंबार नमन !
सिपाही मान सिंह का जन्म 12 अप्रैल 1926 को हरियाणा के झज्जर जिले के खेड़ा गांव में हुआ था। वे 12 अप्रैल 1945 को 19 वर्ष की आयु में सेना में भर्ती हुए थे। उन्हें कुमाऊं रेजिमेंट की 1 (पैरा) बटालियन में शामिल किया गया था। जनवरी 1948 के दौरान, सिपाही मान सिंह की यूनिट जम्मू-कश्मीर के पुंछ सेक्टर में तैनात थी। लेफ्टिनेंट कर्नल प्रीतम सिंह की कमान में यूनिट 161 इन्फेंट्री ब्रिगेड के नियंत्रण में काम कर रही थी। 25 जनवरी 1948 को पुंछ सेक्टर में यूनिट की स्थिति पर दुश्मन सेना ने हमला किया था। उस समय सिपाही मान सिंह एक पिकेट की कमान संभाल रहे थे । 200 से अधिक की संख्या में दुश्मन सेना छह एलएमजी से कवर फायर के तहत पिकेट परिधि के करीब पहुंच गई। अदम्य साहस का परिचय देते हुए सिपाही मान सिंह अपनी खाई से बाहर निकले और दुश्मन की LMG पर ग्रेनेड फेंकते हुए आगे बढ़े। वे दुश्मन की दो LMG को शांत करने में सफल रहे, हालांकि ऐसा करते समय उनके सिर पर LMG की एक गोली लगी। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वे आगे बढ़े और एक और ग्रेनेड फेंका जिससे दुश्मन की एक और LMG नष्ट हो गई। जिसमें वे गंभीर रूप से घायल होकर वीरगति को प्राप्त हो गए । सिपाही मान सिंह को उनकी असाधारण बहादुरी, अपने कर्तव्य के प्रति समर्पण और सर्वोच्च बलिदान के लिए देश का दूसरा सर्वोच्च वीरता पुरस्कार, "महावीर चक्र" दिया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से जयंती पर बारंबार नमन !
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







