आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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| DOB | 1983-09-29 |
| Martyr | Battle Casualty |
कैप्टन देविंदर सिंह जस, "कीर्ति चक्र" (मरणोपरांत) का जन्म 29 सितम्बर 1983 को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में हुआ था। देहरादून में भारतीय सैन्य अकादमी में प्रशिक्षित प्राप्त करने के बाद 2008 में सिग्नल कोर में लेफ्टिनेंट के रूप में नियुक्त हुए। कठिन चयन प्रक्रिया और प्रशिक्षण के बाद कैप्टन जस को जनवरी 2009 में विशिष्ट 1 पैराशूट रेजिमेंट में शामिल किया गया। बाद में नवंबर 2009 में उन्हें जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में तैनात किया गया। 22 फरवरी 2010 को सुरक्षा बलों को जम्मू-कश्मीर में सोपोर जिले के चिंकीपोरा गांव में आतंकवादियों की मौजूदगी के बारे में खुफिया सूत्रों से जानकारी मिली। कट्टर आतंकवादियों को पकड़ने के लिए एक खोज और विनाश अभियान शुरू किया गया और कैप्टन देविंदर सिंह जस को ऑपरेशन का नेतृत्व करने के लिए चुना गया। 23 फरवरी 2010 की सुबह ऑपरेशन शुरू किया। आतंकवादी संदिग्ध क्षेत्र में एक आवासीय इमारत में छिपे हुए थे जिसे एक सुनियोजित कदम के तहत घेर लिया गया था। चुनौती दिए जाने पर आतंकवादियों ने सैनिकों पर गोलीबारी शुरू कर दी और भीषण मुठभेड़ शुरू हो गई और कैप्टन जस एक साहसी कार्रवाई में दो आतंकवादियों को मारने में कामयाब रहे। हालाँकि बंदूक की लड़ाई के दौरान कैप्टन जस गंभीर रूप से घायल हुए और वीरगति को प्राप्त हो गये। कैप्टन देविंदर सिंह जस को उनके असाधारण धैर्य, दृढ़ संकल्प, अटल नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए देश के दुसरे सबसे बड़े शांतिकालीन वीरता पुरस्कार "कीर्ति चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Captain Devinder Singh Jass KC को उनकी जयंती पर नमन!
| DOB | 1976-09-29 |
| Martyr | Battle Casualty |
लांस नायक अरुण कुमार सिंह बिहार के सारण जिले के सरयूपार गांव के रहने वाले थे और उनका जन्म 29 सितंबर 1976 को हुआ था। वे 28 फ़रवरी 1994 को 17 साल की उम्र में सेना में शामिल हुए और उन्हें आर्टिलरी रेजिमेंट की 81 फील्ड रेजिमेंट में भर्ती किया गया। 1999 में, लांस नायक अरुण कुमार की यूनिट जम्मू और कश्मीर के अनंतनाग जिले में तैनात थी। उनकी यूनिट का AOR (द एरिया ऑफ़ रिस्पॉन्सिबिलिटी) आतंकवादियों से भरा हुआ था और यूनिट को नियमित रूप से खुफिया सूत्रों के आधार पर विद्रोह-विरोधी अभियान करने पड़ते थे। लांस नायक अरुण कुमार ऐसी ही एक पेट्रोलिंग का हिस्सा थे। 20 नवंबर 1999 को अरुण कुमार अपने साथियों के साथ अनंतनाग जिले के फतेहपुर गांव के इलाके में पेट्रोलिंग कर रहे थे। पेट्रोलिंग यूनिट करीब 1300 बजे गांव के पास पहुंची, तो एक माइन ब्लास्ट हो गया। ब्लास्ट का बहुत बुरा असर हुआ, जिसमें लांस नायक अरुण कुमार को गंभीर चोटें आईं। उन्हें तुरंत श्रीनगर के 92 बेस आर्मी हॉस्पिटल में ले जाया गया। हालांकि, इलाज के दौरान चोटों की वजह से वे वीरगति को प्राप्त हो गए। लांस नायक अरुण कुमार एक बहादुर सैनिक थे, जिन्होंने 23 साल की उम्र में राष्ट्र की सेवा में अपने प्राण न्योछावर कर दिये। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से L NK ARUN KUMAR SINGH को उनकी जयंती पर नमन!
| DOB | 1967-09-29 |
| Martyr | Battle Casualty |
राइफलमैन निर बहादुर थापा का जन्म 29 सितम्बर 1967 को नेपाल में हुआ था। वे सेना में शामिल हुए और उन्हें 1/5 गोरखा राइफल्स में नियुक्त किया गया। वर्ष 1990 के दौरान उनकी यूनिट श्रीलंका में भारतीय शांति सेना के रूप में तैनात थी। इसी दौरान वे एक सफल ऑपरेशन में एल टी टी इ के उग्रवादियों के साथ लड़ते हुए शहीद हो गए। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Rifleman Nir Bahadur Thapa को उनकी जयंती पर नमन!
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







