आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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सिपाही धर्म राम बेनीवाल, शौर्य चक्र (मरणोपरांत ) का जन्म 21 दिसंबर 1983 को राजस्थान के बाडमेर जिले के तारातारा गांव में हुआ था। 23 जुलाई 2003 को वे सेना में शामिल हुए और उन्हें महार रेजिमेंट की 4 महार बटालियन में नियुक्त किया गया । 25 मई 2015 को सिपाही धर्म राम कुलगाम जिले में शुरू की गई गश्त का हिस्सा बने और युद्ध के दौरान उन्हें दो गोलियां लगीं लेकिन उन्होंने बिना रुके एक आतंकवादी को मार गिराया जिसकी पहचान लश्कर-ए-तैयबा जिला कमांडर के रूप में की गई। घायल सिपाही धर्म राम को उपचार के लिए श्रीनगर के 92 बेस अस्पताल में ले जाया गया जहाँ उन्होंने दम तोड़ दिया और शहीद हो गए। सिपाही धर्म राम ने असाधारण साहस और दृढ़ संकल्प का प्रदर्शन और उनके विशिष्ट वीरतापूर्ण कार्य के लिए उन्हें "शौर्य चक्र" (मरणोपरांत ) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
लेफ्टिनेंट कर्नल इंद्रबल सिंह बावा, "महावीर चक्र" (मरणोपरांत ) का जन्म 25 मई 1947 को लखनऊ, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उन्हें 11 जून 1967 को 4/5 गोरखा रायफ़ल्स रेजिमेंट में नियुक्त किया गया। अगस्त 1987 में भारत-श्रीलंका समझौते के हिस्से के रूप में लेफ्टिनेंट कर्नल इंद्रबल सिंह बावा अपनी बटालियन के साथ इण्डियन पीस कीपिंग फ़ोर्स का हिस्सा बन कर श्रीलंका चले गए। इस ऑपरेशन के दौरान एक आतंकवादी आत्मघाती दस्ते ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी और वे वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए। लेफ्टिनेंट कर्नल इंद्रबल सिंह बावा को उनके असाधारण साहस, अटल नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए देश का दूसरा सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार, "महावीर चक्र" (मरणोपरांत ) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से जयंती पर बारंबार नमन !
कैप्टन राकेश शर्मा, शौर्य चक्र (मरणोपरांत) का जन्म 25 मई 1966 को उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के भरना कला गोवर्धन गांव में हुआ था । 10 जून 1989 को वे भारतीय सैन्य अकादमी से पास आउट हुए और उन्हें 17 मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री में नियुक्त किया गया। वर्ष 2005 के दौरान वे 11 राष्ट्रीय राइफल्स (आर आर) में नियुक्त थे जो जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में तैनात थी। फरवरी 1995 में खुफिया सूत्रों से डोडा जिले की किश्तवाड़ तहसील के भल्ला इलाके में एक आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर की मौजूदगी की जानकारी मिली थी। 04 मार्च 1995 को कैप्टन राकेश शर्मा के नेतृत्व में एक अधिकारी, 4 जेसीओ और 65 अन्य रैंकों की टीम के साथ ऑपरेशन का काम सौंपा गया । इसी दौरान एक भीषण मुठभेड़ हुई जिसमें कुछ आतंकवादियों ने तो आत्मसमर्पण कर दिया परन्तु कुछ शिविर में मौजूद रहे। बचे हुए आतंकवादियों से निपटने के लिए वे तुरंत हरकत में आए और उनमें से एक को ढेर कर दिया और दूसरे को घायल कर दिया। परन्तु खुद गंभीर रूप से घायल हुए और वीरगति को प्राप्त हो गए। कैप्टन राकेश शर्मा को उनके असाधारण साहस, नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार "शौर्य चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से जयंती पर बारंबार नमन !
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







