आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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| DOB | |
| Martyr | Battle Casualty |
कर्नल मनप्रीत सिंह कर्नल मनप्रीत सिंह "कीर्ति चक्र’’ (मरणोपरांत), "सेना मेडल" का जन्म पंजाब के मोहाली जिले के मुल्लनपुर के पास भरोंजियान में हुआ था । 23 वर्ष की आयु में वर्ष 2005 में वे सेना में लेफ्टिनेंट के पद शामिल हुए । उन्होंने 2019 से 2021 तक 19 आरआर में सेकंड इन कमांड (2IC) के रूप में कार्य किया और बाद में कमांडिंग ऑफिसर के रूप में 19 आरआर की कमान संभाली । 12/13 सितंबर 2023 की दरमियानी रात को 19 आरआर और जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवानों के साथ एक संयुक्त अभियान शुरू किया गया। 19 आरआर के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल मनप्रीत सिंह संयुक्त टीम का नेतृत्व कर रहे थे। संयुक्त टीम संदिग्ध क्षेत्र में पहुंची और घेराबंदी एवं तलाशी अभियान शुरू किया। तलाशी अभियान के दौरान, आतंकवादियों ने खतरे को भांपते हुए भागने के प्रयास में सैनिकों पर गोलीबारी की। इसके बाद दोनों ओर से भारी गोलीबारी के साथ भीषण मुठभेड़ हुई। इस दौरान कर्नल मनप्रीत सिंह को गोलियां लगीं और वे गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तुरंत हवाई मार्ग से श्रीनगर अस्पताल ले जाया गया परंतु गंभीर चोटों के कारण वे वीरगति को प्राप्त हो गए। कर्नल मनप्रीत सिंह को उनके असाधारण साहस, कर्तव्य के प्रति समर्पण और सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार "कीर्ति चक्र’’ (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Colonel Manpreet Singh KC SM को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!
| DOB | 1987-10-23 |
| Martyr | Battle Casualty |
Major Aashish Dhonchak SM स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Major Aashish Dhonchak SM को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!
| DOB | 1996-04-20 |
| Martyr | Battle Casualty |
Sepoy Pardeep Singh स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Sepoy Pardeep Singh को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!
| DOB | |
| Martyr | Battle Casualty |
सिपाही गोकल सिंह, "वीर चक्र" (मरणोपरांत), 18वीं बटालियन, राजपूत रेजिमेंट में सिपाही के पद पर तैनात थे। 1967 के नाथू ला संघर्ष के दौरान भारतीय सेना की राजपूत रेजिमेंट के एक वीर योद्धा थे, जिन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया था। 13 सितंबर 1967 को सिक्किम सेक्टर के नाथू ला दर्रे पर चीनी सेना के साथ भीषण झड़प हुई थी। सिपाही गोकल सिंह रीकॉइललेस गन डिटैचमेंट का हिस्सा थे। उन्होंने अत्यधिक साहस का परिचय देते हुए अकेले ही दुश्मन के छह बंकरों को नष्ट कर दिया। इस दौरान वे गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की परवाह किए बिना अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प के साथ दुश्मन का मुकाबला जारी रखा। उनके इस सर्वोच्च बलिदान और असाधारण वीरता के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा वीर चक्र प्रदान किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Sepoy Gokal Singh, VrC को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!
| DOB | 1977-01-04 |
| Martyr | Battle Casualty |
कैप्टन नितिन चव्हाण का जन्म 04 जनवरी 1977 को महाराष्ट्र के पुणे में हुआ था। 13 जून 1998 को वे सेना में भर्ती हुए और उन्हें 115 इंजीनियर रेजिमेंट में नियुक्त किया गया। 1999 के दौरान उनकी यूनिट जम्मू-कश्मीर के राजौरी सेक्टर में आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए तैनात थी। 13 सितम्बर 1999 को कैप्टन नितिन चव्हाण अपने ऑपरेशन के क्षेत्र में एक गश्ती दल का नेतृत्व कर रहे थे। तभी उन्होंने राजौरी सेक्टर के माझियारी स्कूल के पास पांच आतंकवादियों के एक समूह को संदिग्ध रूप में घूमते हुए देखा और उनका पीछा किया। इसके बाद दोनों ओर से भीषण गोलीबारी हुई जिसमें कैप्टन नितिन चव्हाण गंभीर रूप से घायल हुए और वीरगति को प्राप्त हो गए। कैप्टन नितिन चव्हाण एक समर्पित सैनिक और एक उत्कृष्ट अधिकारी थे जिन्होंने राष्ट्र की सेवा में अपने प्राणों की आहुति दी। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Captain Nitin Chavan को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!
| DOB | 1946-09-13 |
| Martyr | Battle Casualty |
मेजर रामास्वामी परमेश्वरन, "परमवीर चक्र" (मरणोपरांत) का जन्म 13 सितम्बर 1946 को मुंबई में हुआ था। वे सेना में शामिल हुए और उन्हें 15 महार रेजिमेंट में नियुक्त किया गया। 1987 में ऑपरेशन पवन के दौरान उनको 8 महार रेजिमेंट में नियुक्त किया गया । अगस्त 1987 के दौरान भारतीय सेना के श्रीलंका पहुंचने के बाद लिट्टे उग्रवादियों को आत्मसमर्पण कराना था लेकिन खतरनाक लिट्टे उग्रवादी पीछे हट गए और भारतीय सेनाओं के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। 25 नवंबर 1987 को मेजर परमेश्वरन को लिट्टे के गढ़ जाफना में उडुविल के पास कंथारोदाई में एक खोज अभियान के लिए सैनिकों की एक टीम का नेतृत्व करने का काम सौंपा गया। जब वे उग्रवादियों के ठिकाने का पता लगाने जा रहे थे तभी भारी हथियारों से लैस उग्रवादियों के एक समूह ने उन पर हमला कर दिया। मेजर परमेश्वरन ने अपने सैनिकों को बचाने के लिए जवाबी हमला शुरू कर दिया और उग्रवादियों को घेर लिया । इसी दौरान उग्रवादियों की एक स्नाइपर से निकली एचएमजी की बर्स्ट से मेजर परमेश्वरन का बायां हाथ की कलाई लगभग कट गई। फिर भी बिना डरे उन्होंने अपने निकटतम उग्रवादी पर हमला किया और उसे गोली मार दी। तभी एक और एचएमजी बर्स्ट उनके सीने में लगा और वे शहीद हो गए परन्तु उग्रवादियों को हराने में सफल रहे। मेजर रामास्वामी परमेश्वरन को उनके साहस, अदम्य लड़ाई की भावना और सर्वोच्च बलिदान के लिए देश के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार "परमवीर चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Major Ramaswamy Parameswaran PVC को उनकी जयंती पर नमन!
| DOB | 1975-09-13 |
| Martyr | Battle Casualty |
कैप्टन रमेश चंद्र रायुडू का जन्म 13 सितम्बर 1975 को आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले में हुआ था । एन डी ए में अपना कठोर प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्हें भारतीय सेना की राजपूत रेजिमेंट की 14वीं बटालियन में लेफ्टिनेंट के रूप में नियुक्त किया गया। वर्ष 2000 में, कैप्टन रमेश चंद्र रायुडू की यूनिट, 14 राजपूत, जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा ज़िले में तैनात थी, जो लगातार आतंकवादी गतिविधियों और अस्थिर सुरक्षा स्थितियों के लिए जाना जाता है। 1 मई, 2000 को एक महत्वपूर्ण मुठभेड़ हुई जब आतंकवादियों ने भारतीय अग्रिम चौकियों पर एक सुनियोजित हमला किया। अनुकरणीय साहस और सामरिक कौशल का परिचय देते हुए, कैप्टन रमेश चंद्र रायुडू ने एक त्वरित आतंकवाद-रोधी अभियान में अपने जवानों का नेतृत्व किया और निडर होकर दुश्मन की ओर बढ़े। भीषण युद्ध में, उन्होंने बहादुरी से लड़ाई लड़ी, अपने सैनिकों का प्रभावी समन्वय किया और भारतीय पक्ष को न्यूनतम क्षति पहुँचाई। हालाँकि, भारी गोलीबारी के बीच, कैप्टन रमेश चंद्र रायुडू को कई गोलियाँ लगीं। तत्काल चिकित्सा सहायता मिलने के बावजूद, कैप्टन रमेश चंद्र रायुडू ने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए। कैप्टन रमेश चंद्र रायुडू एक वीर और प्रतिबद्ध सैनिक थे जिन्होंने देश की सेवा में अपना जीवन बलिदान कर दिया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Captain Ramesh Chander को उनकी जयंती पर नमन!
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







