आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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कर्नल सोमनाथ मिश्रा को बिहार रेजिमेंट की 17वीं बटालियन में कमीशन मिला और वे 63वीं राष्ट्रीय राइफल्स बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर के पद पर तैनात थे। कर्नल मिश्रा एक बहुत ही सम्मानित और समर्पित अधिकारी थे, जो अपनी बेहतरीन लीडरशिप और देश के प्रति अपनी निष्ठा के लिए जाने जाते थे। 63 राष्ट्रीय राइफल्स के कमांडिंग ऑफिसर के तौर पर, उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुश्किल इलाकों में उग्रवाद-विरोधी अभियानों में अहम भूमिका निभाई। मई 2025 में एक सड़क दुर्घटना में कर्नल मिश्रा गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिसके बाद उन्हें दिल्ली छावनी के आर्मी बेस अस्पताल में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान 17 जून, 2025 को कार्डियक अरेस्ट (दिल का दौरा पड़ने) से दिल्ली छावनी के आर्मी बेस अस्पताल में असामयिक निधन हो गया। कर्नल सोमनाथ मिश्रा एक मार्गदर्शक, सर्वोच्च नेतृत्व, उत्कृष्ट अधिकारी थे। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
Battle Casualty
मेजर केतन शर्मा का जन्म 4 अक्टूबर 1987 को उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुआ था। 2012 में वे सेना में भर्ती हुए और उन्हें 57 इंजीनियरिंग रेजिमेंट में तैनात किया गया। 2019 के दौरान उन्हें 19 राष्ट्रीय राइफल्स जो आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग में तैनात थी, उसमें नियुक्त किया गया । 17 जून 2019 को सुरक्षा बलों को खुफिया सूत्रों से आतंकवादियों की मौजूदगी की जानकारी मिली और एक संयुक्त तलाशी अभियान शुरू किया गया, मेजर केतन शर्मा जिसका हिस्सा थे। उग्रवादियों ने भागने के लिए सुरक्षा बलों पर गोलीबारी कर दी जिसमें मेजर केतन के सिर पर गोली लग गई और वे वीरगति को प्राप्त हो गए। उन्होंने ऑपरेशन के दौरान उच्च कोटि का साहस एवं नेतृत्व का प्रदर्शन किया और देश की सेवा में अपना जीवन न्यौछावर कर दिया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
Battle Casualty
मेजर सुखविंदर जीत सिंह रंधावा, कीर्ति चक्र (मरणोपरांत) पंजाब के गुरदासपुर जिले के रहने वाले थे। स्नातक होने के बाद वे सेना के आर्टिलरी रेजिमेंट में भर्ती हुए और बाद में 2 राष्ट्रीय राइफल्स जो आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए कश्मीर घाटी में तैनात थी उसमें उनकी नियुक्ति हुई । खुफिया सूत्रों से मिली जानकारी के आधार पर 17 जून 1997 को मेजर रंधावा को अनंतनाग जिले में एक ऑपरेशन का काम सौंपा गया। जैसे ही मेजर रंधावा अपने सैनिकों के साथ संदिग्ध इलाके में पहुंचे उन पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया। मेजर रंधावा और उनकी टीम ने हमले में सभी आतंकवादियों को मार गिराया परन्तु खुद गंभीर रूप से घायल हो गए और वीरगति को प्राप्त हो गए। मेजर सुखविंदर जीत सिंह रंधावा को उनकी उत्कृष्ट बहादुरी, लड़ाई की भावना, सौहार्द और सर्वोच्च बलिदान के लिए देश का दूसरा सबसे बड़ा शांतिकालीन वीरता पुरस्कार "कीर्ति चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
Battle Casualty
मेजर इंद्रजीत सिंह बब्बर, कीर्ति चक्र (मरणोपरांत) का जन्म 05 सितम्बर 1969 को जम्मू में हुआ था। वे सेना में शामिल हुए और उन्हें 14 फील्ड रेजिमेंट में नियुक्त किया गया। 2003 के दौरान उनकी यूनिट को असम के दरांग जिले में उग्रवाद विरोधी अभियानों के लिए तैनात किया गया । 17 जून 2003 को खुफिया स्रोतों के आधार पर उनकी यूनिट ने एक ऑपरेशन शुरू किया जिसका नेतृत्व मेजर इंद्रजीत सिंह बब्बर को सौंपा गया। इसी दौरान दोनों ओर से भारी गोलीबारी हुई जिसमें मेजर इंद्रजीत सिंह बब्बर और उनके सैनिकों ने तीन आतंकवादियों को मार गिराया लेकिन मुठभेड़ के दौरान मेजर बब्बर गंभीर रूप से घायल हुए और शहीद हो गए। मेजर इंद्रजीत सिंह बब्बर को उनके अदम्य साहस, नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए देश के दूसरे सबसे बड़े शांतिकालीन वीरता पुरस्कार "कीर्ति चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
Battle Casualty
सिपाही हुंगंगा कोन्याक नागालैंड के मोन जिले के लोंगचिंग गांव के रहने वाले थे। वे भारतीय सेना में भर्ती हुए थे और 40 असम राइफल्स में सेवारत थे। 17 जून, 2018 को असम राइफल्स के जवानों और संदिग्ध नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (NSCN-K) के आतंकवादियों के बीच गोलीबारी हुई। टास्क पूरा होने के बाद, जब गश्ती दल अबोई वापस लौट रहा था, तो दोपहर करीब 3.05 बजे, अबोई शहर से तीन किलोमीटर दक्षिण में, आगे चल रहा वाहन आई इ डी ब्लास्ट की चपेट में आ गया और आतंकवादियों ने उस पर गोलियां चला दीं। सिपाही हुंगंगा कोन्याक और उनके साथियों ने तुरंत जवाबी फायरिंग की। गोलीबारी करीब 15 मिनट तक चली। सिपाही हुंगंगा कोन्याक हमले में बुरी तरह घायल हो गए, लेकिन उन्होंने बहादुरी से लड़ाई लड़ी और कड़ा प्रतिरोध किया। गंभीर चोटों के बावजूद, उन्होंने अस्पताल जाने से इनकार कर दिया और उग्रवादियों से भिड़ना जारी रखा। इसके बाद, जब उन्हें पास के जोरहाट अस्पताल ले जाया गया, जँहा वे वीरगति को प्राप्त हो गए। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
सिपाही कुलदीप लकड़ा का जन्म 17 जून 1992 को झारखंड के रांची जिले के बिशाखा टांगा गांव में हुआ था । वर्ष 2014 में वे सेना में शामिल हुए और उन्हें 21 बिहार रेजिमेंट में नियुक्त किया गया। 2017 के दौरान सिपाही लकड़ा की यूनिट को जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र के बटालिक सेक्टर में तैनात किया गया था। भारी बर्फबारी के कारण एक हिमस्खलन 7 अप्रैल 2017 को बटालिक सेक्टर में हुआ। उस दिन 21 बिहार के जवान सेक्टर में अग्रिम चौकियों पर तैनात थे। 21 बिहार के पांच सिपाही भारी बर्फ के नीचे फंस गए थे। सेना ने विशेष हिमस्खलन बचाव दल और उपकरणों को लगाया, जिन्होंने प्रतिकूल मौसम की स्थिति के बावजूद बचाव अभियान जारी रखा। टीम ने पूरी रात खराब मौसम और 15 फीट बर्फ में काम किया और दो सैनिकों को बचाने में सफल रही। हालांकि, सिपाही लाकड़ा, हवलदार प्रभु किरके और लेफ्टिनेंट कर्नल बिहारी मरांडी वीरगति को प्राप्त हो गए। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से जयंती पर बारंबार नमन !
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







