आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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सूबेदार सुरेश चंद यादव, अशोक चक्र (मरणोपरांत) का जन्म 01 जून 1961 को राजस्थान के अलवर जिले के खेतान खेड़ा गांव में हुआ था। वर्ष 1978 में वे सेना में शामिल हुए और उन्हें 13 महार रेजिमेंट में नियुक्त किया गया। वर्ष 2001 में उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड में शामिल होने के लिए चुना गया और 51 स्पेशल एक्शन ग्रुप (51 एसएजी) में नियुक्त किया गया। 24 सितम्बर 2002 को दो हथियारबंद आतंकवादियों ने गुजरात के गांधीनगर में अक्षरधाम स्वामी नारायण मंदिर पर हमला कर दिया । आतंकवादियों ने 30 लोगों की हत्या कर दी और परिसर में मौजूद 100 से ज़्यादा लोगों को घायल कर दिया। सुरक्षा बलों ने इस आतंकवादी हमले से निपटने के लिए "ऑपरेशन वज्र शक्ति" शुरू किया जिसका नेतृत्व 51 एसएजी ने किया। सूबेदार सुरेश चंद यादव भी इस टास्क फोर्स का हिस्सा थे। यह ऑपरेशन 25 सितम्बर 2002 तक चला जिसमें दोनों आतंकवादियों को मार गिराया गया। परन्तु इसी दौरान सूबेदार सुरेश चंद यादव के चेहरे पर कई गोलियां लगी और वे शहीद हो गए। सूबेदार सुरेश चंद यादव को उनकी असाधारण बहादुरी, नेतृत्व, सौहार्द और सर्वोच्च बलिदान के लिए देश के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार "अशोक चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से सूबेदार सुरेश चंद यादव, अशोक चक्र (मरणोपरांत) को उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन ! स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से जयंती पर बारंबार नमन !
लांस नायक हनुमंथप्पा कोप्पड़, सेना मैडल (मरणोपरांत) का जन्म 01 जून 1983 को कर्नाटक के धारवाड़ जिले के कुंडगोल तालुक के बेटादुर गांव में हुआ था। वर्ष 2002 में सेना में शामिल हुए और उन्हें मद्रास रेजिमेंट की 19 मद्रास में नियुक्त किया गया । 2015-16 में लांस नायक हनुमंथप्पा की यूनिट 19 मद्रास को सियाचिन क्षेत्र में तैनात किया गया था। 03 फरवरी 2016 की सुबह सोनम पोस्ट पर एक भयानक हिमस्खलन हुआ जिसमे लांस नायक हनुमन्थप्पा 25 फीट बर्फ के नीचे फंस गए लेकिन उन्हें घटनास्थल से जीवित बचाया गया था। परन्तु 11 फरवरी 2016 को वे उपचार के दौरान शहीद हो गए। लांस नायक हनुमंथप्पा को उनकी बहादुरी प्रतिबद्धता, कर्तव्य के प्रति समर्पण और सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार "सेना मेडल" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया । स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविधालय की ओर से लांस नायक हनुमंथप्पा कोप्पड़, सेना मैडल (मरणोपरांत) को उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन ! स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से जयंती पर बारंबार नमन !
सिपाही प्रभाकर बयाजी पात्रे, वीर चक्र (मरणोपरांत) का जन्म 01 जून 1967 को महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के वागदारी गांव में हुआ था। 21 जुलाई 1986 को वे सेना में शामिल हुए और उन्हें 8 महार रेजिमेंट में नियुक्त किया गया। अक्टूबर 1987 के दौरान उनकी यूनिट श्रीलंका में आई पी के ऍफ़ के रूप में काम कर रही थी। 16 अक्टूबर 1987 को उनकी यूनिट को जाफना किले से जुड़ने का काम सौंपा गया। जैसे ही उनके सैनिक रोड जंक्शन से जाफना किले तक जुड़ने के लिए आगे बढे तो आतंकवादियों ने उनपर भारी गोलीबारी शुरू कर दी। इसी दौरान सिपाही प्रभाकर बयाजी पात्रे अपनी कंपनी के आत्मघाती दस्ते के हिस्से के रूप में काम कर रहे थे और सैनिकों के लिए गोला-बारूद ले जा रहे थे। तभी आतंकवादियों ने उनके दस्ते पर भी घात लगाकर हमला कर दिया। परन्तु सिपाही पात्रे अपने सैनिकों तक गोला-बारूद पहुँचाने में कामयाब रहे। इसी दौरान उनके सीने में कई गोलियाँ लगीं और वे शहीद हो गए। सिपाही प्रभाकर बयाजी पात्रे को उनके विशिष्ट साहस, कर्तव्य के प्रति समर्पण, लड़ाई की भावना और सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार "वीर चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से सिपाही प्रभाकर बयाजी पात्रे, वीर चक्र (मरणोपरांत) को उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन ! स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से जयंती पर बारंबार नमन !
लांस नायक बच्छाव शशिकांत गणपत, शौर्य चक्र" (मरणोपरांत) का जन्म 01 जून 1979 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के वानेर तहसील के डाबली गांव में हुआ था । वे सेना में शामिल हुए और उन्हें 9 मराठा लाइट इन्फेंट्री में नियुक्त किया गया । वर्ष 2007 के दौरान उनकी यूनिट को आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए जम्मू-कश्मीर के बारामूला जिले में तैनात किया गया । 31 जुलाई 2007 को उनकी यूनिट ने खुफिया सूत्रों के आधार पर एक खोज और विनाश अभियान शुरू किया और लांस नायक बच्चव शशिकांत उस टीम का हिस्सा थे। इसी दौरान आतंकवादियों ने सैनिकों पर गोलीबारी शुरू कर दी। गोलीबारी के दौरान लांस नायक बच्चाव शशिकांत घायल हुए और शहीद हो गए। उनके अनुकरणीय साहस, कर्तव्य के प्रति समर्पण और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें वीरता पुरस्कार "शौर्य चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया । स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविधालय की ओर से लांस नायक बच्छाव शशिकांत गणपत, शौर्य चक्र (मरणोपरांत)को उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन ! स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से जयंती पर बारंबार नमन !
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







