आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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| DOB | |
| Martyr | Battle Casualty |
लांस नायक गोविंद सिंह उत्तराखंड के मूल निवासी थे। वे अपने परिवार के तीसरे सदस्य थे जो सेना में भर्ती हुए और उन्हें पैराशूट रेजिमेंट की 9 पैरा पैराशूट बटालियन (एसएफ) में नियुक्त किया गय। अक्टूबर 2015 में, जम्मू और कश्मीर के संघर्ष क्षेत्र में सुरक्षा बलों को खुफिया सूत्रों से सूचना मिली कि लगभग 300 आतंकवादी कश्मीर घाटी में घुसपैठ करने के लिए सीमा के पास घात लगाए बैठे हैं। रिपोर्टों के जवाब में, प्रथम महार और 9 पैरा (एसएफ) के सैनिकों द्वारा टीबा और टिल्ला चौकियों के पास एक अभियान शुरू किया गया। 14 अक्टूबर 2015 को, लांस नायक गोविंद की टीम ने कुछ गतिविधि देखी और चुनौती दिए जाने पर आतंकवादी ने सैनिकों पर गोलीबारी शुरू कर दी। लांस नायक गोविंद और उनके साथियों ने आतंकवादियों का सफाया करने के लिए अदम्य साहस का परिचय दिया और लगभग पाँच आतंकवादियों को मार गिराया। हालाँकि, इस भीषण गोलीबारी में, अपने एक साथी को बचाने की कोशिश करते हुए, लांस नायक गोविंद सिंह दुश्मन की तीन गोलियाँ लगने के कारण गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें पास के एक चिकित्सा संस्थान ले जाया गया, जहाँ से उन्हें उधमपुर के एक सैन्य अस्पताल में एयरलिफ्ट किया गया, लेकिन वे रास्ते में ही वीरगति को प्राप्त हो गए। लांस नायक गोविंद सिंह एक प्रतिबद्ध और बहादुर सैनिक थे जिन्होंने कर्तव्य का पालन करते हुए राष्ट्र की सेवा में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Lance Naik Govind Singh को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!
| DOB | 1975-02-21 |
| Martyr | Battle Casualty |
लेफ्टिनेंट अतुल कटारिया, "सेना मेडल" (मरणोपरांत) का जन्म 21 फरवरी 1975 को गुड़गांव के एक सैन्य परिवार में हुआ था। वर्ष 1996 में वे आईएमए से पास आउट हुए और उन्हें 13 पंजाब रेजिमेंट में नियुक्त किया गया। 1998 के दौरान उनकी यूनिट जम्मू एंड कश्मीर के पुलवामा जिले में तैनात थी। 14 अक्टूबर 1998 को पुलवामा जिले के संगरवानी इलाके में खुफिया रिपोर्ट के आधार पर आतंकवादियों से निपटने के लिए एक खोज एवं विनाश अभियान चलाया गया जिसका नेतृत्व लेफ्टिनेंट अतुल कटारिया को सौंपा गया। लेफ्टिनेंट अतुल ने अपने सैनिकों के साथ आक्रामक शुरुआत की और आतंकवादी ठिकाने पर धावा बोल दिया। इसी दौरान भीषण गोलीबारी हुई जिसमें लेफ्टिनेंट अतुल और उनके सैनिकों ने चार आतंकवादियों को मार गिराया। लेकिन लेफ्टिनेंट अतुल गोलियों की बौछार में फंस गये और शहीद हो गये। लेफ्टिनेंट अतुल कटारिया को राष्ट्र की सेवा में उनकी बहादुरी, नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए "सेना मेडल" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Lieutenant Atul Katarya SM को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!
| DOB | |
| Martyr | Battle Casualty |
लेफ्टिनेंट कर्नल अरुण कुमार छाबड़ा सेना में शामिल हुए और उन्हें 10 पैराशूट रेजिमेंट (एसएफ) में नियुक्त किया गया । वर्ष 1987 में लेफ्टिनेंट कर्नल अरुण कुमार छाबड़ा की यूनिट 10 पैरा (एसएफ) को श्रीलंका में आईपीकेएफ के हिस्से के रूप में शामिल किया गया। उस समय लेफ्टिनेंट कर्नल अरुण कुमार छाबड़ा 10 पैरा (एसएफ) के सेकेंड-इन-कमांड के रूप में कार्यरत थे। 14 अक्टूबर 1989 को 10 पैरा (एसएफ) को लिट्टे के गढ़ के खिलाफ एक साहसी ऑपरेशन का काम सौंपा गया था। ऑपरेशन का नेतृत्व यूनिट के सेकंड- इन- कमांड लेफ्टिनेंट कर्नल अरुण कुमार छाबड़ा ने किया। योजना के अनुसार वे अपनी टीम के साथ हरकत में आये और लिट्टे के गढ़ पर साहसिक आक्रमण किया। लिट्टे उग्रवादी भारी हथियारों से लैस थे जिसके फलस्वरूप दोने ओर से भीषण गोलीबारी हुई जिसमें लेफ्टिनेंट कर्नल अरुण कुमार छाबड़ा और उनकी टीम ने दो आतंकवादियों को मार गिराया। परन्तु जवाबी कार्रवाई में उन्हें गोली लगी और वे शहीद हो गए। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Lt Col Arun Kumar Chhabra SM को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!
| DOB | 1975-10-14 |
| Martyr | Battle Casualty |
कैप्टन शैलेश रियाल्च, सेना मेडल (मरणोपरांत) का जन्म 14 अक्टूबर 1975 को हिमाचल प्रदेश में हुआ था। 06 दिसम्बर 1997 को वे आईएमए, देहरादून से पास आउट हुए और उन्हें इलेक्ट्रिकल्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स (ईएमई) कोर में नियुक्त किया गया। 1999 के दौरान कैप्टन शैलेश रियाल्च की यूनिट 606 ईएमई बटालियन को ऑपरेशन रक्षक के हिस्से के रूप में जम्मू एंड कश्मीर में तैनात किया गया तब वे ईएमई बटालियन के एक फील्ड वर्कशॉप में कार्यरत थे। 24 नवम्बर 1999 को कैप्टन शैलेश के नेतृत्व में एक टीम को जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के पंचगाम में एक ऑपरेशन का काम सौंपा गया। योजना के अनुसार कैप्टन शैलेश अपनी टीम के साथ संदिग्ध क्षेत्र में पहुंचे और आतंकवादियों की घेराबंदी कर दी । इसी दौरान दोनों ओर से भीषण गोलीबारी हुई जिसमें कैप्टन शैलेश और उनके सैनिकों ने एक आतंकवादी को मार गिराया। परन्तु कैप्टन शैलेश गंभीर रूप से घायल हुए और वीरगति हो गए। कैप्टन शैलेश रियाल्च को उनकी उत्कृष्ट बहादुरी, कर्तव्य के प्रति समर्पण और सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार "सेना मेडल" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Capt Shailesh Rialch SM को उनकी जयंती पर नमन!
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







