आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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| DOB | |
| Martyr | Battle Casualty |
सूबेदार सुखदेव सिंह जम्मू-कश्मीर के उधमपुर जिले की मजालता तहसील स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Sub Sukhdev Singh SM को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!
| DOB | 2001-03-01 |
| Martyr | Battle Casualty |
कैप्टन शशिकांत शर्मा, सेना मेडल (मरणोपरांत) का जन्म 01 मार्च को हुआ था। 10 जून 1995 को वे सेना में शामिल हुए और उन्हें 12 जम्मू एंड कश्मीर लाइट इन्फैंट्री में नियुक्त किया गया। अक्टूबर 1998 के दौरान उनकी यूनिट सियाचिन ग्लेशियर में तैनात थी । 03 अक्टूबर 1998 को कैप्टन शशिकांत शर्मा सियाचिन ग्लेशियर में स्थित बाना पोस्ट के कमांडर थे जो भारत के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण पोस्ट है । उस दिन बाना पोस्ट पर पाकिस्तान की ओर से भारी गोलाबारी की गई। कैप्टन शशिकांत शर्मा ने अपने साहसी सैनिकों के साथ दुश्मन की गोलीबारी का मुंहतोड़ जवाब दिया । इसी दौरान कैप्टन शशिकांत को गंभीर चोटें आयी परन्तु अपनी चोटों के बावजूद भी उन्होंने अपनी पोस्ट की रक्षा करना जारी रखा। 05 अक्टूबर 1998 को दुश्मन ने फिर से उनकी पोस्ट पर गोलीबारी की जिससे वे गंभीर रूप से घायल हुए और शहीद हो गए। कैप्टन शशिकांत शर्मा को उनकी वीरता, कर्तव्य के प्रति समर्पण और सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार "सेना मेडल" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Capt Shashikant Sharma SM को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!
| DOB | |
| Martyr | Battle Casualty |
लांस नायक ज्ञान सिंह परिहार मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के रहने वाले थे। वे भारतीय सेना की 25 राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात थे, जो जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों में लगी हुई थी। अक्टूबर 2014 के शुरुआती दिनों में भारत-पाकिस्तान सीमा पर तनाव बेहद बढ़ गया था। पाकिस्तानी सेना लगातार संघर्ष विराम का उल्लंघन कर रही थी। 5 अक्टूबर 2014 को लांस नायक ज्ञान सिंह परिहार पुंछ सेक्टर की एक बेहद संवेदनशील और अग्रिम चौकी पर तैनात थे। इसी दौरान पाकिस्तानी सेना ने अकारण अंधाधुंध फायरिंग और भारी मोर्टार के गोलों से हमला करना शुरू कर दिया। ज्ञान सिंह परिहार और उनकी टीम ने अपनी जान की परवाह न करते हुए पाकिस्तानी गोलाबारी का मुंहतोड़ जवाब दिया। इसी दौरान पाकिस्तान की तरफ से दागा गया एक मोर्टार का गोला पोस्ट के बेहद करीब आकर फटा। मोर्टार फटने से निकले लोहे के नुकीले टुकड़े सीधे ज्ञान सिंह परिहार को लगे, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हुए और वीरगति को प्राप्त हो गये। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से LANCE NAIK GIAN SINGH PARIHAR को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!
| DOB | 1976-10-05 |
| Martyr | Battle Casualty |
सिपाही अर्जुन राम बसवाना का जन्म 5 अक्टूबर 1976 को हुआ था और वे राजस्थान के नागौर जैसलमेर जिले के नागौर पोकरण तहसील के बूढ़ी गुड्डी गांव के रहने वाले थे। 1996 को 20 वर्ष की आयु में सेना मे शामिल हुए और उन्हें उन्हें जाट रेजिमेंट की 4 जाट बटालियन में भर्ती किया गया। 1999 के दौरान, सिपाही अर्जुन राम बसवाना की यूनिट को जम्मू-कश्मीर के कारगिल सेक्टर में तैनात किया गया था। 15 मई 1999 को, सिपाही अर्जुन राम बसवाना राम और चार अन्य सैनिकों, सिपाही भीखा राम, सिपाही नरेश सिंह, सिपाही भंवर लाल बागरिया और सिपाही भूला राम को कैप्टन सौरभ कालिया के नेतृत्व में काकसर सेक्टर में बजरंग पोस्ट पर गश्त करने का काम सौंपा गया। टीम को कैप्टन सौरभ कालिया लीड कर रहे थे। बजरंग पोस्ट के पास पहुँचने के तुरंत बाद, टीम पर लाइन ऑफ़ कंट्रोल के पार तैनात पाकिस्तानी सेना की भारी गोलीबारी हुई। अचानक और ज़ोरदार मुठभेड़ में, सिपाही अर्जुन राम बसवाना ने अपने साथियों के साथ पक्के इरादे से दुश्मन को मुंहतोड़ दिया। हालांकि इसी दौरान पाकिस्तानियो ने उन्हें घेर लिया और युद्धबंदी बना लिया। सिपाही अर्जुन राम बसवाना 15 मई से 7 जून 1999 तक अपने पेट्रोल मेंबर्स के साथ कैद में रहे, और 9 जून 1999 को उनके पार्थिव शरीर वापस आए, तो उन पर लंबे समय तक और बेरहमी से टॉर्चर किए जाने के साफ निशान थे। जिससे यह पता चला कि सैनिकों के साथ युद्धबंदियों के लिए माने गए इंटरनेशनल नियमों का उल्लंघन करते हुए अमानवीय बर्ताव किया गया था। सिपाही अर्जुन राम बसवाना ने बहुत हिम्मत और ड्यूटी के प्रति अटूट समर्पण दिखाते हुए राष्ट्र की सेवा में अपने प्राण न्योछावर कर दिए। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Sep Arjun Ram Baswana को उनकी जयंती पर नमन!
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







