आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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| DOB | 1982-04-10 |
| Martyr | Battle Casualty |
नायक अजय सिंह सलारिया का जन्म 10 अप्रैल 1982 को पठानकोट, पंजाब में हुआ था। वे एक सैन्य पृष्ठभूमि वाले परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता सूबेदार मेजर रछपाल सलारिया ने भी भारतीय सेना में देश की सेवा की थी, जिनसे प्रेरित होकर नायक अजय सिंह सलारिया ने भी सेना में शामिल होने का फैसला किया और 10 जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स का हिस्सा बने। वह जम्मू-कश्मीर के चुनौतीपूर्ण द्रास सेक्टर में तैनात थे, जहां सीमा की सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी अभियानों की जिम्मेदारी उनकी यूनिट को दी गई थी। 17 सितंबर 2016 को, वे अपने साथियों के साथ सीमा सुरक्षा और गश्त पर तैनात थे। इसी दौरान सुरक्षा बलों का सामना आतंकवादियों से हुआ। देश की संप्रभुता की रक्षा करते हुए और घुसपैठ की कोशिशों को नाकाम करने के लिए चलाए गए इस आतंकवाद विरोधी अभियान में दोनों ओर से भारी गोलीबारी शुरू हो गई। इस भीषण मुठभेड़ के दौरान नायक अजय सिंह सलारिया ने अपनी जान की परवाह न करते हुए मोर्चे को संभाला और दुश्मनों को कड़ा जवाब दिया। हालाँकि इसी दौरान गोली लगने से वे गंभीर रूप से घायल हुए और वीरगति को प्राप्त हो गये। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Naik Ajay Singh Salaria को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!
| DOB | 1978-09-17 |
| Martyr | Battle Casualty |
सिपाही नरेंद्र सिंह जाखर हरियाणा के फतेहाबाद जिले की भट्टू कलां तहसील के मेहुवाला गांव के निवासी थे और उनका जन्म 17 सितंबर 1978 को हुआ था। 1996 में वे सेना में शामिल हुए और उन्हें जाट रेजिमेंट की 8वीं जाट बटालियन में कमीशन प्राप्त हुआ। वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान, सिपाही नरेंद्र सिंह की यूनिट को लद्दाख और कश्मीर घाटी को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण जोजी ला दर्रे और काओबल गली क्षेत्र को सुरक्षित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। 8 जुलाई 1999 को, सिपाही नरेंद्र सिंह और उनके दल ने नियंत्रण रेखा (LoC) के पास स्थित 17,000 फीट ऊँची एक अत्यंत दुर्गम पहाड़ी पर चढ़ाई शुरू की। दुश्मन की ओर से हो रही भारी मशीन गन, मोर्टार और तोपखाने की गोलाबारी के बावजूद, इन जांबाजों ने अदम्य साहस दिखाते हुए पहाड़ी को पार किया और भीषण लड़ाई के बाद दुश्मन की चौकी पर कब्जा कर लिया। हालाँकि उसी रात दुश्मन के एक जवाबी तोपखाने हमले में सिपाही नरेंद्र सिंह और उनके साथी गंभीर रूप से घायल हो गए और वीरगति को प्राप्त हुए। सिपाही नरेंद्र सिंह जाखर एक वीर और साहसी सैनिक थे, जिन्होंने 21 वर्ष की आयु में देश की सेवा में अपने प्राणों की आहुति दे दी। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से SEP NARENDER SINGH को उनकी जयंती पर नमन!
| DOB | 1980-09-17 |
| Martyr | Battle Casualty |
हवलदार पलविंदर सिंह का जन्म 17 सितम्बर 1980 को पंजाब के गुरदासपुर जिले की बटाला तहसील के राय चक गांव में हुआ था । वर्ष 2000 में वे सेना में भर्ती हुए और प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्हें सिख रेजिमेंट की 10 सिख बटालियन में नियुक्त किया गया। 2017 के दौरान उनकी यूनिट जम्मू कश्मीर में कुलगाम के काजीगुंड क्षेत्र में आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए तैनात थी। 04 दिसम्बर 2017 को हवलदार पलविंदर सिंह की यूनिट का एक काफिला आतंकवादियों के खिलाफ ऑपरेशन के लिए जा रहा था। इसी दौरान आतंकवादियों ने पूर्व नियोजित तरीके से उन पर हमला कर दिया जिसमें हवलदार पलविंदर सिंह गंभीर रूप से घायल हुए और वीरगति को प्राप्त हो गए। हवलदार पलविंदर सिंह एक वीर और प्रतिबद्ध सैनिक थे जिन्होंने देश की सेवा में अपना जीवन बलिदान कर दिया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Hav Palwinder Singh को उनकी जयंती पर नमन!
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







