आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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| DOB | 1967-06-01 |
| Martyr | Battle Casualty |
सिपाही प्रभाकर बयाजी पात्रे, वीर चक्र (मरणोपरांत) का जन्म 01 जून 1967 को महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के वागदारी गांव में हुआ था। 21 जुलाई 1986 को वे सेना में शामिल हुए और उन्हें 8 महार रेजिमेंट में नियुक्त किया गया। अक्टूबर 1987 के दौरान उनकी यूनिट श्रीलंका में आई पी के ऍफ़ के रूप में काम कर रही थी। 16 अक्टूबर 1987 को उनकी यूनिट को जाफना किले से जुड़ने का काम सौंपा गया। जैसे ही उनके सैनिक रोड जंक्शन से जाफना किले तक जुड़ने के लिए आगे बढे तो आतंकवादियों ने उनपर भारी गोलीबारी शुरू कर दी। इसी दौरान सिपाही प्रभाकर बयाजी पात्रे अपनी कंपनी के आत्मघाती दस्ते के हिस्से के रूप में काम कर रहे थे और सैनिकों के लिए गोला-बारूद ले जा रहे थे। तभी आतंकवादियों ने उनके दस्ते पर भी घात लगाकर हमला कर दिया। परन्तु सिपाही पात्रे अपने सैनिकों तक गोला-बारूद पहुँचाने में कामयाब रहे। इसी दौरान उनके सीने में कई गोलियाँ लगीं और वे शहीद हो गए। सिपाही प्रभाकर बयाजी पात्रे को उनके विशिष्ट साहस, कर्तव्य के प्रति समर्पण, लड़ाई की भावना और सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार "वीर चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Sep Prabhakar Bayaji Patre VrC को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!
| DOB | 1971-10-16 |
| Martyr | Battle Casualty |
कैप्टन चंदर चौधरी सिहाग का जन्म 16 अक्टूबर 1971 को राजस्थान के बीकानेर जिले के डूंगरगढ़ तहसील के बीगावास रामसरा गांव में हुआ था। वर्ष 1998 में वे ऑफिसर ट्रेनिंग अकादमी, चेन्नई से पास आउट हुए और उन्हें 4 ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में नियुक्त किया गया। जुलाई 2002 के दौरान उनकी यूनिट काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशन के लिए जम्मू-कश्मीर के उधमपुर जिले के महोर तहसील में तैनात थी । 09 सितम्बर 2002 को उनकी यूनिट ने उधमपुर जिले के डुबरी गांव में एक खोज एवं विनाश ऑपरेशन शुरू किया जिसका नेतृत्व कैप्टन चंदर चौधरी सिहाग को सौंपा गया। कैप्टन चौधरी मौके पर पहुंचे और तुरंत अपनी घातक प्लाटून के साथ संदिग्ध क्षेत्र की घेराबंदी कर दी। इसी दौरान दोनों ओर से भारी गोलीबारी हुई जिसमें कैप्टन चौधरी और उनके सैनिकों ने एक के बाद एक छह आतंकवादियों को मार गिराया। परन्तु कैप्टन चौधरी को भी मुठभेड़ के दौरान गोली लगी और शहीद हो गए। कैप्टन चंदर चौधरी एक बहादुर और प्रतिबद्ध सैनिक थे जिन्होंने देश की सेवा में अपने प्राण न्योछावर कर दिये। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Captain Chander Choudhary को उनकी जयंती पर नमन!
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







