आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
Read MoreBattle Casualty
लेफ्टिनेंट अनुराग शुक्ला का जन्म झारखंड के पलामू जिले के मेदनीनगर ब्लॉक के सिंगरा खुर्द गांव में हुआ था। वे जम्मू और कश्मीर राइफल्स रेजिमेंट की 10वीं बटालियन के अंतर्गत कार्यरत थे। 19 अप्रैल 2019 के दिन युद्धाभ्यास के समय एक राइफलमैन शरवजीत सिंह को बचाने के दौरान लेफ्टिनेंट अनुराग शुक्ला वीरगति को प्राप्त हो गए। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
मेजर रतनेश कुमार चतुर्वेदी, वीर चक्र (मरणोपरांत) का जन्म 19 अप्रैल 1956 को मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ था। 11 जून 1977 को वे आईएमए, देहरादून से पास आउट हुए और उन्हें 5 राजपुताना राइफल्स में नियुक्त किया गया। अगस्त 1987 में उनकी यूनिट श्रीलंका में आईपीकेएफ के हिस्से के रूप शामिल हुई। 18 अक्टूबर 1987 को 5 राजपुताना राइफल्स को जाफना किले में 1 मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ एक ओप्रशन में शामिल होने का काम सौंपा गया और इस ऑपरेशन का नेतृत्व मेजर रतनेश ने किया। जब ऑपरेशन अंतिम चरण में था तो उग्रवादियों ने भारी मशीनगनों से मेजर रतनेश और उनके सैनिकों पर भारी गोलीबारी कर दी। दोनों ओर से भीषण गोलीबारी हुई जिसमें मेजर रतनेश और उनके सैनिकों ने जवाबी कार्यवाही में छह आतंकवादियों को मार डाला जिसमें से दो को मेजर रतनेश ने अकेले ही मार डाला और बाकि आतंकवादी अपनी चौकी छोड़ कर भाग गए । परन्तु इसी दौरान मेजर रतनेश गंभीर रूप से घायल हुए और शहीद हो गए । मेजर रतनेश कुमार चतुर्वेदी को उनके विशिष्ट साहस, वीरतापूर्ण नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए "वीर चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से जयंती पर बारंबार नमन !
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







