आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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कैप्टन प्रताप सिंह, महावीर चक्र (मरणोपरांत ) का जन्म 17 जनवरी 1960 को बसई दारापुर, नई दिल्ली में हुआ था। कैप्टन प्रताप सिंह को 27 अगस्त 1983 को तोपखाना रेजिमेंट में नियुक्त किया गया। 1988 में कैप्टन प्रताप सिंह एक ऑब्जर्वेशन पोस्ट ऑफिसर के रूप में सियाचिन क्षेत्र में सोनम चौकी पर तैनात थे। 26 मई 1988 को रस्सियों को काटने और सीढ़ी को खोलते समय बड़ी मात्रा में गोला-बारूद और हथगोले पड़े हुए मिले। जब वे उनकी जांच कर रहे थे एक ग्रेनेड बूबी ट्रैप फट गया और वे गंभीर रूप से घायल हो गए और चोटों के कारण वीरगति को प्राप्त हो गए । कैप्टन प्रताप सिंह को उनकी विशिष्ट वीरता, अदम्य भावना और सर्वोच्च बलिदान के लिए देश का दूसरा सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार "महावीर चक्र" (मरणोपरांत ) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
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हवलदार हंगपन दादा, ,अशोक चक्र (मरणोपरांत ) का जन्म 2 अक्टूबर 1979 को अरुणाचल प्रदेश के तिरप जिले के बोरदुरिया गांव में हुआ था। वे 28 अक्टूबर 1997 को पैराशूट रेजिमेंट की तीसरी बटालियन में नियुक्त हुए और 24 जनवरी 2008 को असम रेजिमेंट की चौथी बटालियन में नियुक्त हुए । 2016 के दौरान हवलदार दादा को 35 आरआर में तैनात किया गया। 26 मई 2016 को यूनिट के मीरा पोस्ट पर एक सैनिक ने संदिग्ध हरकत देखी और हवलदार दादा बिना किसी देरी के हरकत में आए और आतंकवादियों को घेरने के लिए अपने सैनिकों को तैनात कर दिया। हवलदार दादा ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दो आतंकवादियों को ढेर कर दिया। इसके बाद हुई आमने-सामने की लड़ाई में हवलदार दादा ने अपनी राइफल की बट से तीसरे आतंकवादी को कुचल दिया और फिर उसकी गर्दन काट दी। हवलदार दादा ने ऑपरेशन में अकेले ही चार आतंकवादियों को मार गिराया। इसी बीच उनकी गर्दन में गोली लगी और वे वीरगति को प्राप्त हो गए। हवलदार हंगपन दादा को 2016 में स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर शांतिकालीन अभियानों के दौरान देश का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार, "अशोक चक्र" (मरणोपरांत ) से सम्मानित किया गया । स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







