आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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नायब सूबेदार चुन्नी लाल, अशोक चक्र ,वीर चक्र, सेना मेडल का जन्म 06 मार्च 1968 को दक्षिण कश्मीर के भदरवाह में हुआ था। सेना में भर्ती होने के बाद उन्हें 8 जम्मू एंड कश्मीर लाइट इन्फेंट्री में नियुक्त किया गया । नायब सूबेदार चुनी लाल ने एक युवा सैनिक के रूप में 1987 में सियाचिन ग्लेशियर में 21,153 फीट पर स्थित बाना पोस्ट पर कब्जे के लिए एक ऑपरेशन में स्वेच्छा से भाग लिया, जिसके लिए उन्हें “सेना मेडल” (वीरता) से सम्मानित किया गया। 26 जून 1987 को नायब सूबेदार चुन्नी लाल (तब सिपाही) "ऑपरेशन राजीव" का हिस्सा बने जिसमें बाना पोस्ट पर कब्ज़ा किया गया। इसके लिए उन्हें वीरता पुरस्कार "वीर चक्र" से सम्मानित किया गया। 2007 के दौरान उनकी यूनिट जम्मू एंड कश्मीर के कुपवाड़ा में तैनात थी। 24 जून 2007 को नायब सूबेदार चुन्नी लाल और उनकी टीम ने नियंत्रण रेखा पर असामान्य हलचल महसूस की और तुरंत कार्रवाई में जुट गए। भारी गोलीबारी के चलते उन्होंने तीन हमलावरों को मार गिराया लेकिन खुद गंभीर रूप से घायल हो गए और वीरगति को प्राप्त हो गए। नायब सूबेदार चुन्नी लाल को उनकी असाधारण बहादुरी, नेतृत्व, सर्वोच्च बलिदान के लिए 15 अगस्त 2007 को देश के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार "अशोक चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया । स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
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स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







