आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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| DOB | 1969-09-14 |
| Martyr | Battle Casualty |
मेजर आलोक माथुर,"सेना मेडल" (मरणोपरांत) का जन्म 14 सितम्बर 1969 को हुआ था। वर्ष 1990 में वे भारतीय सैन्य अकादमी से पास आउट हुए और उन्हें कोर ऑफ इंजीनियर्स में नियुक्त किया गया । 2003 के दौरान मेजर आलोक माथुर अरुणाचल प्रदेश में तैनात 85 आरसीसी यूनिट की कमान संभाल रहे थे जहाँ मेजर आलोक माथुर और उनके सैनिकों को नियमित आधार पर चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था क्योंकि यह क्षेत्र राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में लगे आतंकवादियों से प्रभावित था। 07 अक्टूबर 2003 को कामेंग क्षेत्र में उन्हें एक ऐसे ही ऑपरेशन का सामना करना पड़ा। पूर्व नियोजित चाल में आठ उग्रवादियों ने मेजर आलोक माथुर और उनके सैनिकों पर स्वचालित हथियारों से हमला किया। मेजर आलोक ने तुरंत स्थिति का आकलन किया और मुंहतोड़ जवाब देने के लिए अपने सैनिकों को तैनात किया । इसके बाद भीषण गोलीबारी हुई जिसमें मेजर आलोक माथुर गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तुरंत हवाई मार्ग से नजदीकी सेना अस्पताल में ले जाया गया जहाँ वे शहीद हो गए । मेजर आलोक माथुर को उनके साहस, नेतृत्व कौशल, युद्ध की भावना और सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार "सेना मेडल" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Major Alok Mathur SM को उनकी जयंती पर नमन!
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







