आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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सिपाही गुरबिंदर सिंह, , सेना मेडल (मरणोपरांत) का जन्म 02 जून 1998 को पंजाब के संगरूर जिले की सुनाम तहसील के टोलेवाल गांव में हुआ था । वे 19 साल की उम्र में मार्च 2018 में पंजाब रेजिमेंट की 3 पंजाब बटालियन में भर्ती हुए। जून 2020 के दौरान, सिपाही गुरबिंदर सिंह की यूनिट को वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के करीब पूर्वी लद्दाख में तैनात किया गया था। 15 जून 2020 की रात को, गलवान घाटी में पुल के पार चीनी गतिविधियां देखी गईं स्थिति की गंभीरता को देखते हुए, क्षेत्र में तैनात 16 बिहार बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल संतोष बाबू ने बातचीत का नेतृत्व करने का फैसला किया। हालांकि, चर्चा जल्द ही हिंसक झड़प में बदल गई और चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों सैनिकों पर जानलेवा डंडों और छड़ों से हमला कर दिया। भारतीय सैनिकों की संख्या बहुत कम थी और चीनी सैनिक हमले के लिए तैयार दिख रहे थे। जब झड़पें बढ़ीं, तो सिपाही गुरबिंदर सिंह और 3 पंजाब के अन्य सैनिक भी चीनी सैनिकों से मुकाबला करने के लिए घिरे हुए भारतीय सैनिकों में शामिल हो गए। यह झड़प कई घंटों तक चली, जिसमें सिपाही गुरबिंदर सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए और वीरगति को प्राप्त हो गए । सिपाही गुरबिंदर सिंह को उनके असाधारण साहस, कर्तव्य के प्रति समर्पण और सर्वोच्च बलिदान के लिए 26 जनवरी 2021 को वीरता पुरस्कार," सेना मेडल " से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
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मेजर अजय कुमार जसरोटिया, "सेना मैडल" (मरणोपरांत) का जन्म 31 मार्च 1972 को जम्मू-कश्मीर के जम्मू में हुआ था। 1996 में वे सेना में शामिल हुए और उन्हें जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स की 13 वी बटालियन में नियुक्त किया गया। 1999 के दौरान मेजर अजय सिंह जसरोटिया की यूनिट को ऑपरेशन विजय के हिस्से के रूप में द्रास क्षेत्र में तैनात किया गया । 13 जून 1999 को उनकी यूनिट को अन्य बटालियन के साथ मिलकर प्वाइंट 5140 पर कब्जा करने का काम सौंपा गया और मेजर अजय कुमार जसरोटिया उस टीम का हिस्सा बने। 15 जून 1999 को मेजर जसरोटिया दुश्मन की भारी तोपखाने की गोलाबारी की चपेट में आ गए और शहीद हो गये। मेजर अजय कुमार जसरोटिया को उनकी वीरता, कर्तव्य के प्रति समर्पण, लड़ाई की भावना और सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार "सेना मैडल"(मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया । स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
मेजर विवेक सिंह भंडराल, सेना मेडल (मरणोपरांत) हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा के निवासी थे और उनका जन्म 16 जून 1970 को सैन्य अस्पताल, हैदराबाद में हुआ था। 19 दिसंबर 1992 को वे आई एम् ए से पास आउट हुए और उन्हें 9 मराठा लाइट इन्फैंट्री में नियुक्त किया गया और बाद में उन्हें 21 पैरा (एसएफ) में शामिल किया गया। 2002 के दौरान उनकी यूनिट को "ऑपरेशन पराक्रम" में आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए जम्मू-कश्मीर में तैनात किया गया । 29 अगस्त 2002 को ख़ुफ़िया जानकारी के आधार पर कुपवाड़ा जिले के मच्छल सेक्टर में मेजर विवेक सिंह के नेतृत्व में एक ऑपरेशन शुरू किया गया । इसी दौरान दोनों ओर से भारी गोलीबारी हुई जिसमें मेजर विवेक सिंह की टीम ने दो आतंकवादियों को मार गिराया लेकिन खुद गंभीर रूप से घायल हुए और शहीद हो गए। उनके उत्कृष्ट साहस, नेतृत्व, सौहार्द और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें वीरता पुरस्कार "सेना मेडल" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया । स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से जयंती पर बारंबार नमन !
लेफ्टिनेंट दिग्विजय पंवार का जन्म 16 जून 1974 को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के भलस्वा ईसापुर गांव में हुआ था। वे सेना में शामिल हुए और उन्हें 313 फील्ड रेजीमेंट में नियुक्त किया गया। 1998 के दौरान लेफ्टिनेंट दिग्विजय पंवार की यूनिट "ऑपरेशन राइनो" के हिस्से के रूप में असम के नलबाड़ी जिले में तैनात थी । 06 अगस्त 1998 को उनके एक सैन्य काफिले पर उल्फा उग्रवादियों ने एक आई ई डी विस्फोट कर दिया और उसके तुरंत बाद भारी हथियारों से सैनिकों पर गोलीबारी शुरू कर दी जिसमे लेफ्टिनेंट दिग्विजय पंवार गंभीर रूप से घायल हो हुए और शहीद हो गए। लेफ्टिनेंट दिग्विजय पंवार एक बहादुर सैनिक और एक अच्छे अधिकारी थे जिन्होंने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से जयंती पर बारंबार नमन !
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







