आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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| DOB | 1964-01-03 |
| Martyr |
कैप्टन संदीप शंकला, अशोक चक्र (मरणोपरांत) का जन्म 3 जनवरी 1964 को हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले में हुआ था। 14 जून 1986 को वे भारतीय सेना में भर्ती हुए। प्रशिक्ष्ण पूरा होने के बाद उन्हें डोगरा रेजिमेंट की 18 डोगरा बटालियन में नियुक्त किया गया। उनकी बटालियन को 1991 में आतंकवाद विरोधी अभियान के लिए जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में तैनात किया गया। 08 अगस्त 1991 को खुफिया सूत्रों के आधार पर कैप्टन संदीप शंकला के नेतृत्व में आतंकवादियों को पकड़ने एवं खोज और विनाश करने का अभियान शुरू किया गया। जिसमे दोनों ओर से भीषण गोलीबारी हुई। इस ऑपरेशन के दौरान कैप्टन संदीप शंकला और उनकी टीम ने 9 आतंकवादियों को मार गिराया और 22 आतंकवादियों को पकड़ लिया। लेकिन कैप्टन संदीप शंकला गंभीर रूप से घायल हुए और वीरगति को प्राप्त हो गए। कैप्टन संदीप शंकला को उनके उत्कृष्ट साहस, कर्तव्य के प्रति समर्पण और सर्वोच्च बलिदान के लिए देश का सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार, "अशोक चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Capt Sandeep Shankla AC को उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







