आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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| DOB | 1937-11-02 |
| Martyr | Battle Casualty |
कैप्टन कपिल सिंह थापा, महावीर चक्र (मरणोपरांत) का जन्म 02 नवम्बर 1937 उत्तराखंड के देहरादून जिले के पंडितवाड़ी गांव में हुआ था। 30 जून 1963 को वे सेना में शामिल हुए और उन्हें 3 जाट रेजिमेंट में नियुक्त किया गया। सितम्बर 1965 के दौरान उनकी यूनिट पंजाब सेक्टर में तैनात थी। इसी दौरान पाकिस्तान ने जम्मू और कश्मीर के अखनूर पर कब्जा करने के उद्देश्य से "ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम" शुरू किया। तभी भारतीय सेना ने भी अपने युद्ध का क्षेत्र पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र को बनाया ताकि दुश्मन को पंजाब की रक्षा के लिए अखनूर ऑपरेशन में लगे सैनिकों को स्थानांतरित करने के लिए मजबूर किया जा सके। 21 सितम्बर 1965 को कैप्टन कपिल सिंह थापा को डोगराई गांव के उत्तर-पश्चिमी छोर पर कब्जा करने का काम सौंपा गया। वे अपने साथियों के साथ मिलकर दिए गए लक्ष्य पर कब्ज़ा करने में सफल रहे। परन्तु इसी दौरान भारी गोलीबारी में कैप्टन थापा गंभीर रूप से घायल हुए और शहीद हो गए। कैप्टन कपिल सिंह थापा को उनके अदम्य साहस, उत्कृष्ट नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए देश के दूसरे सबसे बड़े वीरता पुरस्कार "महावीर चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Captain Kapil Singh Thapa, MVC को उनकी जयंती पर नमन!
| DOB | 1975-11-02 |
| Martyr | Battle Casualty |
विंग कमांडर डेरिल कैस्टेलिनो, "कीर्ति चक्र" (मरणोपरांत) का जन्म 2 नवंबर 1975 को मुंबई में हुआ था। उन्हें IAF के लिए चुना गया और 20 जून 1988 को 22 साल की उम्र में कमीशन दिया गया। उन्होंने हेलीकॉप्टर पायलट के रूप में प्रशिक्षण प्राप्त किया और 161वें पायलट कोर्स के भाग के रूप में उत्तीर्ण हुए। 25 जून 2013 को विंग कमांडर डैरिल को एमआई-17 हेलीकॉप्टर के कप्तान और चालक दल के साथ 11000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ में आवश्यक आपूर्ति और राष्ट्रीय आपदा राहत बल (एनडीआरएफ) की टीमों को ले जाने और फंसे हुए तीर्थयात्रियों को बचाने का काम सौंपा गया था। विंग कमांडर डेरिल कैस्टेलिनो सफलतापूर्वक ने 80 बहुमूल्य जिंदगियाँ बचाईं। हालाँकि बेहद ख़राब मौसम और विमान में हुई तकनीकी खराबी के चलते केदारनाथ से गुप्तकाशी की वापसी के दौरान विमान घाटी की खड़ी ढलानों से टकराया और दुर्घटनाग्रस्त हो गया और वे वीरगति को प्राप्त हो गए। विंग कमांडर डेरिल को उनके उत्कृष्ट साहस, कर्तव्य के प्रति समर्पण और सर्वोच्च बलिदान के लिए देश का दूसरा सबसे बड़ा शांतिकालीन वीरता पुरस्कार, "कीर्ति चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Wing Commander Darryl Castelino KC को उनकी जयंती पर नमन!
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







