आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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| DOB | 1973-08-23 |
| Martyr | Battle Casualty |
लेफ्टिनेंट गौतम गुरुंग, “सेना मेडल” (मरणोपरांत) का जन्म 23 अगस्त 1973 को उत्तराखंड के देहरादून जिले में हुआ था। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने सेना में कमीशन लिया। प्रशिक्ष्ण पूरा होने के बाद उन्हें गोरखा रेजिमेंट की 3/4 गोरखा राइफल्स बटालियन में नियुक्त किया गया। उनकी यूनिट को कश्मीर में तंगधार घाटी में तैनात किया गया था। 3/4 गोरखा राइफल्स को सीमा पार से अकारण गोलीबारी का सामना करने के अलावा, उनका जिम्मेदारी का क्षेत्र भी सक्रिय उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्र में आ गया। 04 अगस्त 1999 को पाकिस्तानी घुसपैठियों का गोलीबारी द्वारा 3/4 गोरखा राइफल्स के बंकरो में से एक बंकर पर सीधा हमला हुआ जिससे कुछ सैनिक गंभीर रूप से घायल हो गए। गोलीबारी के बीच सैनिकों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाना अत्यधिक जोखिम भरा था। फिर भी, अपनी जान की परवाह किए बिना, लेफ्टिनेंट गौतम गुरुंग ने अपने साथियों की जान बचाने के लिए बचाव अभियान जारी रखा। हालाँकि, ऐसा करते समय उन्हें गोले का छर्रा लगा और वे गंभीर रूप से घायल हो गए। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और ज़्यादा से ज़्यादा सैनिकों को बचाने के लिए अभियान जारी रखा। लेकिन 5 अगस्त 1999 को वे वीरगति को प्राप्त हो गए। लेफ्टिनेंट गौतम गुरुंग को उनके अदम्य साहस, कर्तव्यनिष्ठा और सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार, “सेना मेडल” (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से को उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







