आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
नायक मनोज सिंह, शौर्य चक्र (मरणोपरांत) का जन्म 10 मई 1982 को उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले की खटीमा तहसील के नागरा तराई गांव में हुआ था। वे 22 मार्च 2003 को 20 साल की उम्र में सेना में शामिल हो गए। उन्हें पैराशूट रेजिमेंट में भर्ती किया गया । बाद में उन्हें कठोर चयन प्रक्रिया के माध्यम से 1 पैरा (एसएफ) में शामिल होने के लिए चुना गया । 22 मार्च 2009 को नायक मनोज सिंह और कुछ अन्य सैनिकों को जम्मू और कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में हफरुदा जंगल की ओर जाने वाले ट्रैक का निरीक्षण करने का काम सौंपा गया। नायक मनोज सिंह ने कुछ संदिग्ध हरकत देखी और तुरंत कार्रवाई की। चुनौती दिए जाने पर आतंकवादियों ने सैनिकों पर अंधाधुंध गोलीबारी की। इसके बाद हुई गोलीबारी में एक गोली उनकी राइफल में लगी और वह बेकार हो गई। नायक मनोज सिंह ने आगे बढ़कर आतंकवादियों पर हथगोले फेंके। हालांकि ऐसा करते समय वे गंभीर रूप से घायल हुए और 23 मार्च 2009 को वीरगति को प्राप्त हो गए। नायक मनोज सिंह को उनके असाधारण साहस, नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार "शौर्य चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से जयंती पर बारंबार नमन !
नायक सुखदेव सिंह, वीर चक्र (मरणोपरांत) का जन्म 10 मई 1962 को पंजाब के जालंधर जिले के भटनुरा गांव में हुआ था। वे सेना में शामिल हुए और उन्हें 9 पैरा (एसएफ) में नियुक्त किया गया। मार्च 1989 के दौरान उनकी यूनिट को IPKF के हिस्से के रूप में श्रीलंका में तैनात किया गया । 04 मार्च 1989 को खुफिया जानकारी के आधार पर नायक सुखदेव सिंह और उनके साथियों को उग्रवादियों के एक शिविर को नष्ट करने का काम सौंपा गया । जैसे ही सैनिक संदिग्ध क्षेत्र में पहुंचे उन्हें 150 से अधिक उग्रवादियों के शिविर का सामना करना पड़ा। इसी दौरान दोनों ओर से भीषण गोलीबारी शुरू हुई जिसमें नायक सुखदेव सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें नजदीकी सेना के अस्पताल में लाया गया जहाँ 13 मार्च 1989 को वे वीरगति को प्राप्त हो गए। नायक सुखदेव सिंह को उनके असाधारण साहस, अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार "वीर चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से जयंती पर बारंबार नमन !
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







