आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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| DOB | 1965-12-01 |
| Martyr | Battle Casualty |
नायब सूबेदार सुभाष चंद्र, शौर्य चक्र (मरणोपरांत) का जन्म 01 दिसम्बर 1965 को राजस्थान के सीकर जिले के भैरूपुरा गांव में हुआ था। 1986 में वे सेना में शामिल हुए और उन्हें 10 पैराशूट रेजिमेंट (स्पेशल फाॅर्स) में नियुक्त किया गया। वर्ष 2007 के दौरान उनकी यूनिट आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए जम्मू एंड कश्मीर में तैनात थी । 03 अक्टूबर 2007 को ख़ुफ़िया सूत्रों से बांदीपोरा इलाके में लश्कर-ए-तैयबा के जिला कमांडर सहित कुछ कट्टर आतंकवादियों की मौजूदगी की जानकारी मिली । नायब सूबेदार सुभाष चंद्र के नेतृत्व में आतंकवादियों के खिलाफ एक खोज और विनाश अभियान शुरू किया गया । संदिग्ध इलाके में पहुँच कर जैसे ही सैनिकों ने तलाशी अभियान शुरू किया आतंकवादियों ने उनपर भारी गोलीबारी शुरू कर दी। इसी दौरान नायब सूबेदार सुभाष चंद्र एवं उनके सैनिकों ने लश्कर-ए-तैयबा के जिला कमांडर सहित दो आतंकवादियों को मार गिराया। परन्तु भारी गोलीबारी में नायब सूबेदार सुभाष चंद्र को कई गोलियां लगीं और वे शहीद हो गए। नायब सूबेदार सुभाष चंद्र को उनके असाधारण साहस, लड़ाई की भावना, कर्तव्य के प्रति समर्पण और सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार "शौर्य चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Naib Subedar Subhash Chandra SC को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







