आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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| Martyr | Battle Casualty |
कैप्टन संजय चौहान, शौर्य चक्र (मरणोपरांत) का जन्म हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में हुआ था । दिसम्बर 1991 में वे सेना में शामिल हुए और उन्हें 16 राजपूताना राइफल्स में नियुक्त किया गया। 1994 के दौरान उनकी यूनिट जम्मू-कश्मीर के चोकीबल क्षेत्र में तैनात थी। कैप्टन संजय और उनकी टीम अक्सर उग्रवादियों का वेश धारण करते थे और उनके रैंक और फ़ाइल में घुसपैठ करते थे। फिर वे बहुत आसानी से उग्रवादियों को ख़त्म कर देते थे । 28 अक्टूबर 1994 को उनकी यूनिट को वारिबन जंगल के लछिमपोरा गांव में आतंकवादियों के एक बड़े जमावड़े की जानकारी मिली जिसके आधार पर कैप्टन संजय को आतंकवादियों को निष्क्रिय करने के लिए एक ऑपरेशन का काम सौंपा गया। योजना के अनुसार कैप्टन संजय अपनी टीम के साथ एक आतंकवादी संगठन में शामिल हो गए और फिर संदिग्ध क्षेत्र की ओर निकल गए। जल्द ही वे एक गाँव पहुँचे जहाँ उनका स्वागत वहाँ मौजूद अन्य उग्रवादियों ने किया। परन्तु वे अपनी पहचान अधिक समय तक गुप्त नहीं रख सके और उन्हें तुरंत उचित कार्रवाई करनी पड़ी। इसी दौरान कैप्टन संजय और उनके सैनिक उग्रवादियों से घिर गए। उन्होंने आतंकवादियों का डटकर मुकाबला किया और आठ कट्टर आतंकवादियों को मार गिराया। परन्तु यूनिट की मदद समय पर नहीं पहुंचने के कारण उनका गोला-बारूद ख़त्म हो गया और आतंकवादियों ने उन्हें ज़िंदा पकड़ लिया। बाद में उनके शव बरामद किये गए । कैप्टन संजय को उनके उत्कृष्ट साहस, नेतृत्व, लड़ाई की भावना और सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार "शौर्य चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Capt Sanjay Chauhan SC को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







