आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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सूबेदार बहादुर सिंह "वीर चक्र" (मरणोपरांत) का जन्म 10 जनवरी 1953 को जम्मू-कश्मीर के जम्मू जिले के डिगियाना गांव में हुआ था। 1971 में वे सेना में भर्ती हो गए और उन्हें जम्मू एंड कश्मीर लाइट इन्फैंट्री की 12वी बटालियन में नियुक्त किया गया। मई 1999 में कारगिल ऑपरेशन के दौरान उनकी यूनिट 12 जम्मू एंड कश्मीर लाइट इन्फैंट्री को ऑपरेशन में भाग लेने के लिए बटालिक सेक्टर में तैनात किया गया। 11 जून 1999 को एक मिशन को लॉन्च किया गया था जिसमें सूबेदार बहादुर सिंह की प्लाटून को लगभग 17,400 फीट की ऊंचाई पर दुश्मन के एक ठिकाने को बेअसर करने का काम सौंपा गया था। सूबेदार बहादुर सिंह चुपचाप उत्तर से दुश्मन के करीब पहुंच गए और गोलाबारी शुरू की और दुश्मन के दो सैनिकों को मौके पर मार गिराया । इसके बाद भीषण गोलीबारी हुई और सूबेदार बहादुर सिंह को गोली लग गई और वे वीरगति को प्राप्त हो गए। सूबेदार बहादुर सिंह को उनकी उत्कृष्ट बहादुरी, लड़ाई की भावना, कर्तव्य के प्रति समर्पण और सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार, "वीर चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया । स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







