आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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कैप्टन सुनील कुमार चौधरी, सेना मेडल, कीर्ति चक्र (मरणोपरांत) का जन्म 22 जून 1980 को कठुआ के पास गोविंदसर गांव में हुआ था। वे 10 दिसंबर 2004 को आईएमए से पास आउट हुए और 11 गोरखा राइफल्स में नियुक्त हुए। 26 जनवरी 2008 को कैप्टन सुनील को असम के तिनसुकिया जिले के नाओपाथर गांव में उल्फा आतंकवादियों के खिलाफ एक ऑपरेशन के दौरान उनकी उत्कृष्ट वीरता के लिए " सेना मेडल " से सम्मानित किया गया था। 27 जनवरी 2008 को कैप्टन सुनील को असम के रंगगढ़ गांव में 7 से 9 उल्फा आतंकवादियों की मौजूदगी के बारे में जानकारी के आधार पर एक ऑपरेशन का काम सौंपा गया । जब घेराबंदी की जा रही थी तो घर के अंदर छिपे आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। भारी गोलीबारी के चलते कैप्टन सुनील एवं उनकी टीम ने तीन आतंकवादियों को मार गिराया परन्तु इसी दौरान वे खुद गंभीर रूप से घायल होने के कारण वीरगति को प्राप्त हो गए। कैप्टन सुनील कुमार चौधरी को उनके उत्कृष्ट साहस, अडिग लड़ाई की भावना और अपने कर्तव्य के प्रति सर्वोच्च बलिदान के लिए देश के दूसरे सबसे बड़े शांतिकालीन वीरता पुरस्कार "कीर्ति चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया । स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से जयंती पर बारंबार नमन !
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







