आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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पैराट्रूपर संजोग छेत्री, अशोक चक्र (मरणोपरांत) का जन्म 26 जनवरी 1982 को दक्षिणी सिक्किम के बोमटाल गांव में हुआ था। 31 मार्च 2001 को वे सेना में शामिल हुए और उन्हें 9 पैरा (एसएफ) में नियुक्त किया गया । 2003 के दौरान उनकी यूनिट जम्मू-कश्मीर में तैनात थी और नियमित आधार पर उग्रवाद विरोधी अभियानों में शामिल थी। 22 अप्रैल 2003 को खुफिया सूत्रों से हिल काका इलाके में कुछ कट्टर आतंकवादियों की मौजूदगी की जानकारी मिली। आतंकवादियों से निपटने के लिए उनकी यूनिट ने एक ऑपरेशन शुरू किया और पैराट्रूपर संजोग छेत्री इस ऑपरेशन के लिए चुने गए । जैसे ही सैनिक आगे बढ़े और आतंकियों के ठिकाने के पास पहुंचे आतंकवादियों ने उन पर फायरिंग कर दी। इसके बाद दोनों ओर से भीषण गोलीबारी हुई जिसमें पैराट्रूपर संजोग छेत्री ने तीन आतंकवादियों को अकेले ही मार गिराया। परन्तु खुद गंभीर रूप से घायल हुए और शहीद हो गए। पैराट्रूपर संजोग छेत्री को उनके विशिष्ट साहस, अदम्य भावना और सर्वोच्च बलिदान के लिए देश के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार "अशोक चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







