इस युद्ध में भारत की जीत हुई जिससे भारत की सेना ने 1962 की हार का बदला लिया।
भारत-चीन सीमा पर 14,200 फुट पर नाथूला दर्रा स्थित है। नाथूला में केवल 20-30 मीटर की दूरी पर भारतीय और चीनी सैनिक तैनात थे। जलेपला एवं नाथूला के एक भाग पर भारत का अधिकार था। चीन ने भारत को नाथूला और जलेपला दर्रा खाली करने का अल्टीमेटम दिया। मुख्यालय के आदेश के बाद भारत की 17 माउंटेन डिवीजन ने जलेपला को खाली कर दिया लेकिन नाथूला पर तैनात जीओसी मेजर जनरल सगत सिंह ने नाथूला को खाली करने से मना कर दिया (उनकी ज़िद के कारण ही आज भी नाथूला भारत के अधिकार में है)।
17 अगस्त 1967 से चीनी सैनिकों ने सिक्किम के नाथूला में ट्रंेच खोदना और बंकर बनाना षुरू कर दिया, जिसका विरोध करते हुए भारतीय सेना ने सीमा को इंगित करने के लिए कांटेदार तार लगाने का निर्णय लिया। चीन की सेना ने कुछ बंकर बना लिए थे जबकि भारत की ओर खुला मैदान था। पूर्वानुमान के कारण भारतीय सेना ने पास ही एक पहाडी पर दो तोप लगा लीं जिसका चीन को पता नहीं चला।
भारतीय सेना ने 11 सितंबर 1967 की सुबह नाथूला से सेबूला तक सीमा पर बाड़ लगाना षुरू कर दिया। इसके तुरंत बाद एक चीनी राजनीतिक आयुक्त, रेनरोंग एवं भारत के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल राय के मध्य बातचीत आरम्भ हुई। वार्ता में उस समय यथा स्थिति बनाये रखने और अपने मुख्यालय से आगे के निर्देष लेने की बात तय हुई। परन्तु जैसे ही राय बातचीत करके बाहर निकले, चीनी सेना ने विश्वासघात करते हुए उनपर गोलियां चला दीं और लेफ्टिनेंट कर्नल राय वहीं शहीद हो गए। लेफ्टिनेंट कर्नल राय के घायल होते ही भारत के वीर सिपाहियों ने मोर्चा संभाल लिया। भारत के सिपाही उस समय खुले मैदान में थे जबकि चीन के सिपाही बंकरों में थे। किसी प्रकार का कोई रक्षा कवच न होने के कारण चीनी गोलीबारी में भारत के 70 जवान षहीद हो गए।
षीघ्र ही पास की पहाडी पर लगायी गयी तोपों से भारतीय सिपाहियों ने चीनी बंकरो पर तोपें दागनी आरम्भ कर दीं। एक एक करके चीन के सभी बंकर भारतीय सेना ने ध्वस्त कर दिये, 3 दिन चली गोलीबारी में चीन के 400 सैनिक मारे गये। तीन दिन बाद चीन ने भारत से युद्ध विराम की पेषकष की जिसे भारत ने स्वीकार कर लिया।
1 अक्टूबर 1967 को फिर से भारत और चीन के बीच एक संघर्श चोला में हुआ जो नाथूला के उत्तर में सिक्किम-तिब्बत सीमा पर एक दर्रा है। यहाँ पर भारतीय सेना ने चीनी सेना को उनकी चौकी से लगभग 3 किलोमीटर पीछे धकेल दिया। दो हिंसक झडपों के दौरान भारतीय सेना के 88 सैनिक षहीद हुए जबकि चीनी सेना के 400 सैनिक मारे गए। भारतीय सेना ने सिद्ध कर दिया कि चीन को हराना भारत के लिए कठिन नहीं है।
सुभारती परिवार इस युद्ध में षहीद हुए सभी भारतीय सैनिकों को सादर नमन करता है। जय हिन्द!
सभी क्रान्तिकारी जानते थे कि वे जो कर रहे थे उस से देष स्वतन्त्र नहीं होगा। फिर भी वे क्रानितकारी गतिविधियों के कारण अपनी जान देने के लिए तत्पर थे। उन्हें यह विष्वास था कि उनकी क्रान्तिकारी गतिविधियों के कारण हजारों लोग प्रेरित होकर आगे बढे़ंगे और उससे देष स्वतन्त्र होगा। यह थी उनकी निस्वार्थ देष भक्ति! सुभारती परिवार समस्त क्रान्तिकारियों एवं षहीदों को सादर नमन करता है।
दुष्मन के हवाई हमले को निश्फल करते भारतीय थल एवं वायु सेना




