मेजर उष्णिशा जैटली, कीर्ति चक्र (मरणोपरांत)
मेजर उष्णिशा जैटली का जन्म 22 जुलाई 1967 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ जिले में हुआ था। अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने भारतीय सेना में प्रवेश किया और उन्हें 11 गोरखा राइफल्स की 3/11 गोरखा राइफल्स बटालियन में कमीशन प्राप्त हुआ। यह रेजिमेंट अपने निर्भीक सैनिकों तथा अनेक गौरवपूर्ण युद्ध अभियानों के लिए प्रसिद्ध है। सैन्य प्रशिक्षण पूरा करने के उपरांत उन्होंने विभिन्न चुनौतीपूर्ण परिचालन क्षेत्रों में सेवाएँ दीं और उत्कृष्ट सैनिक कौशल तथा नेतृत्व क्षमता वाले एक कुशल अधिकारी के रूप में अपनी पहचान बनाई।
दिसंबर 2001 के दौरान मेजर उष्णिशा जैटली की 3/11 गोरखा राइफल्स बटालियन 'ऑपरेशन रक्षक' के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले के मेंढर सेक्टर में तैनात थी। यह क्षेत्र आतंकवाद से अत्यधिक प्रभावित था, जिसके कारण बटालियन को आतंकवादियों के विरुद्ध नियमित रूप से अभियान चलाने पड़ते थे। इकाई के कार्यक्षेत्र के निकट स्थित नियंत्रण रेखा (एलओसी) अत्यंत संवेदनशील और सक्रिय थी, जहाँ बिना किसी पूर्व चेतावनी के अक्सर युद्धविराम उल्लंघन की घटनाएँ होती रहती थीं। यह क्षेत्र घुसपैठ की दृष्टि से भी अत्यंत संवेदनशील था, इसलिए सीमा पार से होने वाली किसी भी घुसपैठ को रोकने के लिए नियमित रूप से सशस्त्र गश्त की जाती थी।
खुफिया सूत्रों से मेंढर सेक्टर में कुछ आतंकवादियों की मौजूदगी की सूचना मिलने पर सुरक्षा बलों ने 1 दिसंबर 2001 को एक सर्च ऑपरेशन शुरू करने का निर्णय लिया। इस अभियान का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी मेजर उष्णिशा जैतली को सौंपी गई।
जब मेजर उष्णिशा जैटली अपने सैनिकों के साथ संदिग्ध क्षेत्र में पहुँचे, तभी भारी हथियारों से लैस आतंकवादियों के एक समूह ने उन पर अचानक हमला कर दिया। यद्यपि यह हमला अप्रत्याशित था, फिर भी मेजर जैतली और उनके सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए तत्काल मोर्चा संभाल लिया। आतंकवादियों ने पहले से सुनियोजित घात लगाकर हमला किया था और सुरक्षित स्थानों से स्वचालित हथियारों द्वारा लगातार गोलीबारी कर रहे थे।
भीषण मुठभेड़ के दौरान मेजर उष्णिशा जैटली ने असाधारण वीरता और अद्वितीय साहस का प्रदर्शन करते हुए दो आतंकवादियों को मार गिराया। किंतु इस दौरान उन्हें कई गोलियाँ लगीं और वे गंभीर रूप से घायल हो गए। गंभीर चोटों के कारण उन्होंने शीघ्र ही वीरगति प्राप्त की और मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।
मेजर उष्णिशा जैतली एक समर्पित सैनिक और दृढ़ निश्चयी अधिकारी थे, जिन्होंने सदैव अग्रिम पंक्ति में रहकर अपने सैनिकों का नेतृत्व किया और कर्तव्य पालन करते हुए अपने प्राण राष्ट्र के लिए न्योछावर कर दिए। उनके अद्वितीय साहस, अदम्य युद्ध भावना तथा सर्वोच्च बलिदान के सम्मान में भारत सरकार ने उन्हें 15 अगस्त 2002 को राष्ट्र के द्वितीय सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार "कीर्ति चक्र" से मरणोपरांत अलंकृत किया।




