कैप्टन मेहता सिंह का जन्म 1 अगस्त 1922 को हुआ था और वे पंजाब के रहने वाले थे। उन्होंने 20 वर्ष की आयु में सेना में भर्ती होकर सिख लाइट इन्फैंट्री रेजिमेंट की तीसरी सिख एलआई बटालियन में कमीशन प्राप्त किया, जो अपने निडर सैनिकों और विभिन्न युद्ध सम्मानों के लिए जानी जाती है।
नागालैंड अभियान : जुलाई 1956
सन् 1956 में कैप्टन मेहता सिंह की यूनिट 3 सिख एलआई नागालैंड के कोहिमा में तैनात थी। उस दौरान यूनिट के ऑपरेशन क्षेत्र में कई नागा उग्रवादी सक्रिय थे। परिणामस्वरूप, यूनिट के सैनिक नियमित रूप से उग्रवाद-विरोधी अभियानों में लगे रहते थे। जून 1956 के अंत में, सुरक्षा बलों को खुफिया सूत्रों से खोनामा गांव (नागा नेता ए.जे. फ़िज़ो का गांव) में नागा उग्रवादियों की उपस्थिति की सूचना मिली। आशंका थी कि उग्रवादियों ने गांव के ऊपरी हिस्से पर कब्जा कर लिया है। कैप्टन मेहता सिंह के नेतृत्व में 3 सिख एलआई की 'डी' कंपनी को घिरे हुए गांव में भेजने का निर्णय लिया गया।
कैप्टन मेहता सिंह और उनके जवानों ने अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प के साथ एक महीने से अधिक समय तक गाँव के निचले हिस्से पर अपना कब्ज़ा बनाए रखा। चूंकि इलाका दुश्मनों से घिरा हुआ था, इसलिए सैनिकों के लिए रसद की व्यवस्था करना बेहद मुश्किल था। यह काम कड़ी गश्त और कभी-कभी हवाई मार्ग से रसद पहुँचाकर ही संभव हो पाया। एक महीने बाद, जुलाई 1956 के अंत में, 17 राजपूत रेजिमेंट की एक कंपनी को 3 सिख एलआई कंपनी की जगह भेजा गया। 28 जुलाई 1956 को, 17 राजपूत रेजिमेंट के सैनिकों की भारी संख्या को देखकर, नागा उग्रवादियों ने जवाबी कार्रवाई के लिए आक्रामक रुख अपना लिया। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए, कैप्टन मेहता सिंह ने उग्रवादियों के खिलाफ आक्रमण शुरू करने का फैसला किया।
इसके बाद हुई आमने-सामने की लड़ाई में कैप्टन मेहता सिंह ने आगे बढ़कर नेतृत्व किया और आतंकवादियों को पीछे धकेलने में सफल रहे। उन्होंने इस अभियान के दौरान असाधारण साहस और नेतृत्व का प्रदर्शन किया और लक्ष्य हासिल किया। हालांकि, गोलीबारी के दौरान कैप्टन मेहता सिंह के पेट में एलएमजी की गोली लगी और वे गंभीर रूप से घायल हो गए। बाद में उन्होंने दम तोड़ दिया और शहीद हो गए। कैप्टन मेहता सिंह को उनके असाधारण साहस, नेतृत्व, कर्तव्यनिष्ठा और सर्वोच्च बलिदान के लिए देश के दूसरे सर्वोच्च शांति काल के वीरता पुरस्कार, "अशोक चक्र" द्वितीय श्रेणी (जिसे अब कीर्ति चक्र के नाम से जाना जाता है) से सम्मानित किया गया।
स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविधालय की ओर से कैप्टन मेहता सिंह “अशोक चक्र" (मरणोपरांत) को उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन !




