कैप्टन दिलीप कुमार झा, कीर्ति चक्र (मरणोपरांत) का जन्म 02 जनवरी 1977 को बिहार के दरभंगा जिले के हरिपुर गाँव में हुआ था। श्री नथुनी झा के पुत्र कैप्टन दिलीप कुमार ने अपनी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा कटिहार में की और फिर बारहवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी करने के लिए मसूरी चले गए। चूँकि कैप्टन दिलीप ने बहुत कम उम्र में अपनी माँ को खो दिया था इसलिए उनके पिता ने अकेले ही उनका पालन-पोषण किया। मसूरी में उन्होंने 1985 से 1995 तक ओक ग्रोव बॉयज़ स्कूल में पढ़ाई की। वह एथलेटिक्स में अच्छे थे और ओक ग्रोव बॉयज़ स्कूल में वे 1994 में स्कूल एथलेटिक कप्तान बने। उनके बचपन से ही सशस्त्र बलों में शामिल होने की तीव्र इच्छा थी। बचपन और बड़े होने तक अपने सपने का पालन करना जारी रखा। उनका सपना तब सच हुआ जब 1995 में स्कूली शिक्षा के बाद उनका चयन एनडीए के लिए हो गया। बाद में वे आगे के प्रशिक्षण के लिए आईएमए गए और 1999 में 22 साल की उम्र में लेफ्टिनेंट के रूप में पास हुए।
उन्हें 11 दिसंबर 1999 को सेना आयुध कोर (एओसी) में नियुक्त किया गया था, जो एक महत्वपूर्ण शाखा है, जो युद्ध और शांति के दौरान भारतीय सेना को रसद सहायता प्रदान करने के लिए जिम्मेदार है। सेना आयुध कोर की भूमिका सेना की सभी इकाइयों को सभी प्रकार के भंडार सही समय पर सही मात्रा में सही स्थान पर और सही कीमत पर उपलब्ध कराना है। एओसी की सूची में सैनिक की कपड़ों से लेकर हथियारों तक सुई से लेकर टैंक तक और ईंधन चारे और दवाओं को छोड़कर सभी युद्ध सामग्री तक की हर कल्पनीय आवश्यकता शामिल होती है। हालाँकि एक लेफ्टिनेंट के रूप में उन्हें उनकी पहली नियुक्ति के रूप में 7 जाट रेजिमेंट में प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया था। 2001 में उन्हें कैप्टन के पद पर पदोन्नत किया गया।
2002 के दौरान कैप्टन दिलीप कुमार झा जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में तैनात 7 जाट रेजिमेंट में कार्यरत थे। यूनिट के सैनिक नियमित आधार पर आतंकवादियों के खिलाफ ऑपरेशन में लगे हुए थे क्योंकि यूनिट का जिम्मेदारी क्षेत्र (एओआर) उग्रवाद से सक्रिय था। यूनिट का एओआर घने जंगल और चरम मौसम की स्थिति वाले सुदूर ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी इलाकों तक फैला हुआ है, खासकर सर्दियों के मौसम में। यह क्षेत्र घुसपैठ के लिए भी संवेदनशील था जिससे सीमा पार से किसी भी घुसपैठ को रोकने के लिए नियमित सशस्त्र गश्त की आवश्यकता होती थी। कैप्टन दिलीप कुमार झा घातक प्लाटून कमांडर के रूप में कार्यरत थे और सितंबर 2002 तक उन्होंने 8 महत्वपूर्ण आतंकवाद विरोधी अभियानों में भाग लिया। जिसमें 27 से अधिक आतंकवादी मारे गए थे। 02 अक्टूबर 2002 की रात को कैप्टन दिलीप कुमार पुंछ जिले के मेंढर सेक्टर में गश्त पर थे उन्होंने आतंकवादियों के एक समूह को नाले के माध्यम से घुसपैठ करते हुए देखा। स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए कैप्टन दिलीप ने घुसपैठियों को घेरने के लिए तुरंत अपने सैनिकों को तैनात कर दिया।
जैसे ही वे करीब आए कैप्टन दिलीप ने करीब से गोलीबारी की और एक आतंकवादी को मार गिराया। परिणामस्वरूप शेष दो आतंकवादी घने पत्तों और झाड़ियों का लाभ उठाकर इधर-उधर भाग गए। कैप्टन दिलीप अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिना आगे बढ़े और भाग रहे आतंकवादियों से भिड़ गए। ठंडे साहस और सराहनीय नेतृत्व का परिचय देते हुए वह शेष आतंकवादियों को भी मारने में सफल रहे। हालांकि भारी गोलीबारी के दौरान कैप्टन दिलीप को भी गोलियां लगीं और वे शहीद हो गए। कैप्टन दिलीप कुमार झा एक बहादुर सैनिक और सर्वोत्कृष्ट अधिकारी थे, जिन्होंने एक अच्छे सैन्य नेता की तरह आगे बढ़कर अपने लोगों का नेतृत्व किया और 25 साल की उम्र में देश की सेवा में अपना जीवन न्यौछावर कर दिया। कैप्टन दिलीप कुमार झा को उनके अनुकरणीय साहस, अडिग लड़ाई की भावना, सौहार्द और सर्वोच्च बलिदान के लिए देश के दूसरे सबसे बड़े शांतिकालीन वीरता पुरस्कार 'कीर्ति चक्र' (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया।
स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से कैप्टन दिलीप कुमार झा, कीर्ति चक्र (मरणोपरांत) को उनकी जयंती पर बारंबार नमन !




