कैप्टन शशिकांत शर्मा, सेना मेडल (मरणोपरांत) का जन्म एक सैन्य परिवार में वायु सेना अधिकारी फ्लाइट लेफ्टिनेंट जे.पी. शर्मा और श्रीमती सुदेश शर्मा के घर हुआ था। बचपन से ही वह अपने पिता के नक्शेकदम पर चलकर सशस्त्र बलों में सेवा करना चाहते थे। उनका सपना तब सच हुआ जब उन्हें 1991 में एनडीए के लिए चुना गया और उन्होंने एनडीए खड़कवासला और आईएमए, देहरादून में अपने प्रशिक्षण के दौरान कई पुरस्कार जीते। बाद में 10 जून 1995 को उन्हें 12 जम्मू एंड कश्मीर लाइट इन्फैंट्री में नियुक्त किया गया, एक रेजिमेंट जो अपने निडर सैनिकों और कई युद्ध सम्मानों के लिए जानी जाती है।
अपनी यूनिट के साथ कुछ वर्षों तक सेवा करने के बाद कैप्टन शशिकांत शर्मा को दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर में तैनात किया गया था। भारतीय चौकियाँ सियाचिन ग्लेशियर के दक्षिण पश्चिम में संकीर्ण साल्टोरो पर्वतमाला पर स्थित थीं जहाँ सैनिकों को बर्फीली हवाओं और शून्य से नीचे के तापमान के साथ प्रतिकूल मौसम का सामना करना पड़ता था।
अक्टूबर 1998 के दौरान कैप्टन शशिकांत शर्मा को सियाचिन ग्लेशियर से लगभग 20 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में स्थित साल्टोरो रिज पर तैनात किया गया था। 03 अक्टूबर 1998 की रात को 21000 फीट से अधिक की बर्फीली ऊंचाइयों पर बाना पोस्ट पर पाकिस्तान की ओर से भारी गोलाबारी की गई थी। उस दिन कैप्टन शशिकांत शर्मा बाना पोस्ट के कमांडर थे जो भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण पोस्ट थी। कैप्टन शशिकांत शर्मा ने अपने साहसी सैनिकों के साथ दुश्मन की ओर से बिना उकसावे की गोलीबारी का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए जवाबी हमला किया। हालांकि इस दौरान कैप्टन शशिकांत की दाहिनी जांघ और पेट में गंभीर चोट लग गई।
अपनी चोटों के बावजूद कैप्टन शशिकांत शर्मा ने आग को निर्देशित करना और अपनी पोस्ट की रक्षा करना जारी रखा। 05 अक्टूबर १९९८ की सुबह कैप्टन शशिकांत शर्मा को माथे में गोली लगी जिससे वे गंभीर रूप से घायल हुए और शहीद हो गए। कैप्टन शशिकांत शर्मा को उनकी वीरता, कर्तव्य के प्रति समर्पण और सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार "सेना मेडल" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया।
स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से कैप्टन शशिकांत शर्मा, सेना मेडल (मरणोपरांत) को उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन !




